भारत आज अपने महान समाज सुधारकों में से एक बाबा आमटे को उनकी 18वीं पुण्यतिथि (9 फरवरी 2026) पर श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण कर रहा है। यह अवसर उनके गरीबों, बीमारों और वंचितों के लिए समर्पित आजीवन सेवा को एक बार फिर केंद्र में लाता है। बाबा आमटे ने विशेष रूप से कुष्ठ रोगियों और आदिवासी समुदायों के सम्मान, समानता और न्याय के लिए अपना जीवन अर्पित किया। उनके विचार, संघर्ष और कार्य आज भी देशभर में सामाजिक आंदोलनों, सार्वजनिक सेवा और नागरिक समाज को प्रेरणा देते हैं, और वर्षों बाद भी उनकी विरासत जीवित है।
बाबा आमटे की पुण्यतिथि 2026 9 फरवरी को मनाई जा रही है, जो वर्ष 2008 में उनके निधन के 18 वर्ष पूरे होने का प्रतीक है। इस दिन पूरे देश में उनके कुष्ठ रोग पुनर्वास, सामाजिक न्याय और पर्यावरण आंदोलनों में दिए गए अतुलनीय योगदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। शैक्षणिक संस्थान, सामाजिक संगठन और नागरिक समाज उनके करुणा, सेवा और मानव गरिमा के आदर्शों को याद करते हैं।
बाबा आमटे, जिनका जन्म 26 दिसंबर 1914 को महाराष्ट्र में मुरलीधर देविदास आमटे के रूप में हुआ, एक संपन्न परिवार से थे। उन्होंने कानून की पढ़ाई की और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में जेल गए नेताओं की पैरवी की। लेकिन कुष्ठ रोगियों की अमानवीय सामाजिक उपेक्षा को करीब से देखने के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। इसी अनुभव ने उन्हें सुख-सुविधाओं वाला जीवन त्यागकर समाज के सबसे उपेक्षित वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित होने की प्रेरणा दी।
बाबा आमटे को मुख्यतः कुष्ठ रोग पुनर्वास के लिए जाना जाता है। उन्होंने महाराष्ट्र में आनंदवन (वन ऑफ जॉय) की स्थापना की, जो कुष्ठ रोग से प्रभावित लोगों के लिए उपचार, शिक्षा और रोजगार प्रदान करने वाला आश्रम था। जब समाज उन्हें बहिष्कृत करता था, तब बाबा आमटे ने उन्हें समानता और सम्मान के साथ अपनाया। आनंदवन एक आत्मनिर्भर समुदाय बना और मानवीय पुनर्वास का वैश्विक उदाहरण स्थापित किया, जिसने समाज की कुष्ठ रोग के प्रति सोच को हमेशा के लिए बदल दिया।
अपने जीवन के उत्तरार्ध में बाबा आमटे नर्मदा बचाओ आंदोलन का प्रमुख चेहरा बने। उन्होंने सरदार सरोवर जैसे बड़े बांधों का विरोध किया, जिनसे हजारों आदिवासी परिवार विस्थापित हो रहे थे। लगभग सात वर्षों तक नर्मदा नदी के तट पर रहकर उन्होंने जबरन विस्थापन, पर्यावरणीय क्षति और अपर्याप्त पुनर्वास के मुद्दों को उजागर किया। उनकी सहभागिता ने आंदोलन को नैतिक बल और राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
बाबा आमटे का दृढ़ विश्वास था कि विकास मानव-केंद्रित और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ होना चाहिए। नर्मदा आंदोलन के दौरान उन्होंने आदिवासी अधिकारों, नदी पारिस्थितिकी और दीर्घकालिक पर्यावरणीय नुकसान पर गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना था कि प्रगति मानव पीड़ा की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। अहिंसक संघर्ष और जमीनी दृष्टिकोण के जरिए उन्होंने भारत में विकास बनाम विस्थापन की बहस को नई दिशा दी और पर्यावरणीय न्याय के अग्रदूत बने।
समाज के प्रति असाधारण सेवा के लिए बाबा आमटे को अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इनमें पद्म श्री, पद्म विभूषण, रैमन मैग्सेसे पुरस्कार, गांधी शांति पुरस्कार और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार पुरस्कार शामिल हैं। ये सम्मान मानवता, सामाजिक सुधार और पर्यावरणीय सक्रियता के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान को मान्यता देते हैं।
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