भारतीय रिज़र्व बैंक ने आपदा-प्रभावित क्षेत्रों के लिए लोन रीस्ट्रक्चरिंग के लिए संशोधित दिशानिर्देश पेश किए हैं, जिससे बैंकों और NBFCs को ज़्यादा लचीलापन मिलेगा। यह नया नियम 1 जुलाई, 2026 से लागू होगा। इस नए फ्रेमवर्क के तहत, लोन देने वाली संस्थाएँ (lenders) उधार लेने वालों के अनुरोध का इंतज़ार किए बिना ही सक्रिय रूप से लोन रीस्ट्रक्चर कर सकेंगी; साथ ही, इसमें 5% प्रोविज़निंग की अनिवार्यता भी रखी गई है। इस कदम का उद्देश्य प्रभावित उधारकर्ताओं को तेज़ी से वित्तीय राहत पहुँचाना है, और साथ ही बैंकिंग प्रणाली में वित्तीय स्थिरता बनाए रखना भी है।
नए नियमों में अहम बदलाव यह है कि अब लोन देने वाली संस्थाएँ (Lenders) उन इलाकों में, जो प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित हैं, अपनी मर्ज़ी से लोन रीस्ट्रक्चरिंग की प्रक्रिया शुरू कर सकती हैं।
इससे ये बातें सुनिश्चित होती हैं:
हालाँकि, उधार लेने वालों के पास अभी भी नियंत्रण रहेगा; उन्हें आपदा की घोषणा की तारीख से 135 दिनों की ‘ऑप्ट-आउट’ (प्रक्रिया से बाहर निकलने की) विंडो मिलेगी।
इसके अलावा, पात्रता की अवधि को बढ़ाकर 89 दिनों तक करने के अनुरोधों को भी अस्वीकार कर दिया गया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह राहत केवल वास्तविक रूप से आपदा-प्रभावित उधारकर्ताओं तक ही पहुँचे।
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