सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण में क्रीमी लेयर के निर्धारण में माता-पिता के पद और उनके सामाजिक-प्रशासनिक दर्जे को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। अदालत ने केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज करते हुए कई UPSC उम्मीदवारों को राहत दी, जिन्हें गलत तरीके से OBC क्रीमी लेयर मानकर नियुक्ति से रोक दिया गया था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि माता-पिता की आय मात्र को क्रीमी लेयर निर्धारित करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय संबंधित प्राधिकरणों को माता-पिता की नौकरी का प्रकार, सामाजिक स्थिति और उनके पद जैसे अन्य कारकों को भी ध्यान में रखना होगा। इस निर्णय का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि OBC समुदाय के भीतर वास्तव में वंचित और पिछड़े वर्गों तक ही आरक्षण का लाभ पहुँचे।
ओबीसी क्रीमीलेयर का दर्जा तय किए जाने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि ओबीसी क्रीमीलेयर का दर्जा केवल उम्मीदवार के माता-पिता के वेतन से होने वाली आय के आधार पर तय नहीं हो सकता। उम्मीदवार के माता-पिता की स्थिति और पद की श्रेणी दोनों महत्वपूर्ण हैं। उनके स्टेटस और सेवा श्रेणी पर विचार किए बिना केवल उनकी आय के आधार पर ओबीसी आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर का दर्जा निर्धारित नहीं किया जा सकता।
शीर्ष अदालत ने दिए फैसले में कहा कि 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम (कार्यालय ज्ञापन) में दिए गए पदों की श्रेणियों और स्टेटस के मापदंडों के संदर्भ के बगैर केवल उम्मीदवार के माता-पिता की आय के आधार पर क्रीमी लेयर का दर्जा तय करना कानूनन गलत है। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि ओबीसी आरक्षण की पात्रता का निर्धारण करते समय निजी कंपनियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के कर्मचारियों के बच्चों और सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को अलग मानना भेदभावपूर्ण है।
“क्रीमी लेयर” शब्द का अर्थ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समुदाय के उन आर्थिक और सामाजिक रूप से उन्नत वर्गों से है, जिन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाता है। इस अवधारणा को भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1992 में दिए गए ऐतिहासिक फैसले इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ में प्रस्तुत किया था। यह निर्णय मंडल आयोग की सिफारिशों के कार्यान्वयन से जुड़ा हुआ था, जिसमें यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया कि आरक्षण का लाभ वास्तव में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों तक ही पहुँचे।
वर्तमान में अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर की पहचान के लिए वार्षिक आय सीमा ₹8 लाख निर्धारित की गई है। यदि किसी व्यक्ति का परिवार इस सीमा से अधिक आय अर्जित करता है, तो उसे क्रीमी लेयर की श्रेणी में माना जाता है। ऐसे व्यक्तियों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में OBC के 27% आरक्षण का लाभ नहीं मिलता, क्योंकि आरक्षण का उद्देश्य समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को अवसर प्रदान करना है।
यह मुद्दा इसलिए उठा क्योंकि क्रीमी लेयर की स्थिति तय करने के तरीके को लेकर विवाद सामने आए, विशेष रूप से पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSUs), बैंकों और निजी कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों के मामले में। पहले कुछ नियमों में मुख्य रूप से माता-पिता की आय को आधार बनाया जाता था, जिसके कारण सरकारी कर्मचारियों और अन्य क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों के बीच अलग-अलग तरह का व्यवहार देखने को मिलता था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि केवल आय के आधार पर सामाजिक उन्नति का निर्धारण नहीं किया जा सकता। इसलिए क्रीमी लेयर की स्थिति तय करते समय कई कारकों—जैसे माता-पिता का पद, नौकरी का प्रकार और सामाजिक स्थिति—को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि आरक्षण का लाभ वास्तव में जरूरतमंद और पिछड़े वर्गों तक पहुँचे।
[wp-faq-schema title="FAQs" accordion=1]Lpg crisis in india reason: भारत वर्तमान में एक महत्वपूर्ण LPG कमी का सामना कर…
भारत घरेलू सेमीकंडक्टर (चिप) निर्माण को मजबूत करने और वैश्विक सेमीकंडक्टर केंद्र बनने के लक्ष्य…
NITI Aayog ने फिसकल हेल्थ इंडेक्स 2026 (Fiscal Health Index 2026 का दूसरा वार्षिक संस्करण…
छत्तीसगढ़ की राज्य मंत्रिपरिषद ने छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026 के मसौदे को मंजूरी दे…
भारतीय पैरा एथलीट शैलेश कुमार ने विश्व पैरा एथलेटिक्स ग्रैंड प्रिक्स में स्वर्ण पदक जीतकर…
नई दिल्ली में प्योरएयर टॉवर (PureAir Tower) नामक भारत का पहला माइक्रोएल्गी आधारित एयर प्यूरीफिकेशन…