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नागौरी पान मेथी को किसानों के लिए PPVFRA पेटेंट मिला

राजस्थान के नागौर जिले की प्रसिद्ध नागौरी पान मेथी को पौधा किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार प्राधिकरण (PPVFRA) द्वारा पेटेंट (पंजीकरण) प्रदान किया गया है। यह पंजीकरण फरवरी 2026 में पौध विविधता पत्रिका में आधिकारिक रूप से प्रकाशित किया गया। इसे कम्युनिटी फार्मर्स वैरायटी श्रेणी के अंतर्गत मान्यता दी गई है, जिससे नागौर जिले के किसानों को इस फसल पर वैधानिक स्वामित्व और कानूनी अधिकार प्राप्त हुए हैं।

नागौरी पान मेथी का PPVFRA पंजीकरण

नागौरी पान मेथी का PPVFRA पंजीकरण किसानों द्वारा विकसित पारंपरिक फसल किस्मों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह बौद्धिक संपदा संरक्षण पौधा किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार अधिनियम 2001 के तहत प्रदान किया गया है, जो प्रजनकों और किसानों दोनों के अधिकारों की रक्षा करता है।

इस पंजीकरण के साथ नागौर जिले के किसानों को इस फसल का आधिकारिक संरक्षक माना गया है। किसानों की ओर से इस अधिकार का प्रतिनिधित्व पंचायत समिति मुंडवा की प्रधान गीता देवी कर रही हैं।

राजस्थान में नागौरी पान मेथी की खेती

नागौरी पान मेथी मेथी की एक विशिष्ट किस्म है, जिसकी खेती मुख्य रूप से नागौर जिले में ही की जाती है। यह लगभग 7,000 हेक्टेयर क्षेत्र में उगाई जाती है। इसकी प्रमुख खेती मुंडवा, नागौर, मेड़ता सिटी, जायल, डेगाना और खींवसर क्षेत्रों में होती है।

यह एक मल्टी-कट पत्तेदार पौधा है, जिसका अर्थ है कि किसान एक ही मौसम में इसकी पत्तियों की कई बार कटाई कर सकते हैं। पत्तियों को धूप में प्राकृतिक रूप से सुखाकर बाजार में मसाले के रूप में बेचा जाता है।

किसानों के लिए उच्च आय का स्रोत

  • नागौरी पान मेथी किसानों के लिए अत्यधिक लाभदायक फसल मानी जाती है।
  • प्रति कटाई लगभग 175 किलोग्राम सूखी पत्तियाँ प्रति एकड़ प्राप्त होती हैं।
  • हर 10 दिनों में लगभग ₹25,000 की आय हो सकती है।
  • एक मौसम में लगभग 10 कटाई संभव होने से किसान प्रति एकड़ लगभग ₹2.5 लाख तक वार्षिक आय प्राप्त कर सकते हैं।

वर्ष 2024–25 के कृषि सत्र में नागौर के किसानों ने लगभग 30,000 मीट्रिक टन सूखी नागौरी पान मेथी का उत्पादन किया, जिससे लगभग ₹450 करोड़ की आय हुई।

किसानों के लिए PPVFRA संरक्षण का महत्व

नागौरी पान मेथी को PPVFRA से मिली मान्यता किसानों के पारंपरिक कृषि ज्ञान और फसल किस्मों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। पहले इस फसल को बौद्धिक संपदा संरक्षण प्राप्त नहीं था और व्यापारी इसे अक्सर कसूरी मेथी जैसे अन्य नामों से बेचते थे।

अब कानूनी मान्यता मिलने से किसानों को बायोपायरेसी, अनधिकृत बीज बिक्री और फसल के आनुवंशिक संसाधनों के दुरुपयोग से सुरक्षा मिलेगी। साथ ही इस फसल के व्यावसायिक उपयोग या शोध से होने वाले लाभ में किसानों को हिस्सा मिलने का अधिकार भी मिलेगा।

भविष्य की संभावनाएँ: GI टैग और निर्यात

PPVFRA पंजीकरण के बाद अब इस फसल की पहचान और बाजार मूल्य बढ़ाने के लिए आगे कदम उठाए जा रहे हैं। विशेषज्ञों ने इसके लिए GI टैग प्राप्त करने का सुझाव दिया है, जिससे इसकी क्षेत्रीय पहचान और मजबूत होगी।

इसके अलावा भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के माध्यम से खाद्य सुरक्षा मानक विकसित करने और निर्यात के लिए अलग HSN कोड बनाने की भी योजना है।

PPVFRA क्या है?

पौधा किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार प्राधिकरण (PPVFRA) भारत में पौधों की किस्मों के पंजीकरण और संरक्षण के लिए जिम्मेदार संस्था है। यह पौधा किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार अधिनियम 2001 के तहत कार्य करती है।

इसका उद्देश्य नई पौध किस्मों का पंजीकरण करना, प्रजनकों के अधिकारों की रक्षा करना और किसानों द्वारा संरक्षित आनुवंशिक संसाधनों के योगदान को मान्यता देना है।

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