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मणिपुर के काले चावल और गोरखपुर टेराकोटा को मिला जीआई टैग

मणिपुर के काले चावल और गोरखपुर टेराकोटा को मिला जीआई टैग |_3.1
मणिपुर के काले चावल, जिसे चाक-हाओ भी कहा जाता और गोरखपुर के टेराकोटा एवं कोविलपट्टी की कदलाई मितई को भौगोलिक संकेत टैग (Geographical Indication tag) दिया गया है। चाक-हाओ के लिए आवेदन चाक-हाओ (काले चावल) के उत्पादकों के संघ द्वारा दायर किया गया था, जिसे मणिपुर सरकार के कृषि विभाग और पूर्वोत्तर क्षेत्रीय कृषि विपणन निगम लिमिटेड (NERACAC) द्वारा सहायता दी गई थी। गोरखपुर टेराकोटा के लिए उत्तर प्रदेश के लक्ष्मी टेराकोटा मुर्तिकला केंद्र द्वारा आवेदन दायर किया गया था।

ब्लैक राइस या काला चावल:
इस चावल किस्म के चावल का रंग गहरा काला होता है और इसका वजन अन्य रंग के चावल की किस्मों की तुलना में अधिक होता है, जैसा कि भूरे चावल का होता है। चावल का अधिक वजन और इसका काला रंग मुख्य रूप से एंथोसायनिन एजेंट के कारण  होता है। यह चावल मिठाई, दलिया बनाने के लिए उपयुक्त माना जाता है।

गोरखपुर टेराकोटा:

गोरखपुर का टेराकोटा लगभग सौ वर्ष  पुराना है। हस्तशिल्पियों द्वारा प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली दोमट मिट्टी से तैयार की गई छोटी-बड़ी आकृतियों और मूर्तियों का पकने के बाद लाल रंग खुद ब खुद निखर कर सामने आता है। सबसे खास बात यह कि दीपदान हो या मोर, नक्काशी किए हुए झूमर, लैम्प और पंछियों की आकृतियां या फिर पांच फीट का हाथी बनाने में चाक या सांचे का उपयोग नहीं होता। शिल्पकार हाथों से इसे गढ़ते हैं।

कोविलपट्टी कदलाई मित्तई:
कदलाई मितई तमिलनाडु के दक्षिणी भागों में बनाई जाने वाली मूंगफली कैंडी है। मूंगफली और गुड़ से कैंडी को तैयार की जाता है। इसमें विशेष रूप से थामीबरानी नदी के पानी का उपयोग किया जाता है।
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