पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को उस समय नई मजबूती मिली, जब राजस्थान के कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के चारों ओर इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) घोषित किया गया। यह अधिसूचना अरावली पर्वत श्रृंखला की नाज़ुक पारिस्थितिकी की रक्षा पर केंद्रित है, साथ ही यह सुनिश्चित करती है कि संरक्षण के साथ-साथ आसपास रहने वाले समुदायों का कल्याण और सतत विकास भी बना रहे।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के आसपास क्षेत्र को इको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित करने की अधिसूचना जारी की है। इसका उद्देश्य जैव विविधता का संरक्षण करना और अभयारण्य के आसपास रहने वाले स्थानीय समुदायों को सहयोग देना है।
| विषय | विवरण |
| इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) | राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास के क्षेत्र, जो बफर/शॉक एब्जॉर्बर के रूप में कार्य करते हैं। |
| नीतिगत आधार | राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना (2002–2016) के अनुसार, सामान्यतः पार्क/अभयारण्य की सीमा से 10 किमी तक के क्षेत्र को ESZ घोषित किया जाता है। |
| 10 किमी नियम | यह एक दिशानिर्देश है; वास्तविक ESZ की सीमा क्षेत्र-विशेष की पारिस्थितिकी के अनुसार कम–ज़्यादा हो सकती है। |
| 10 किमी से बाहर क्षेत्र | यदि कोई क्षेत्र पारिस्थितिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हो (जैसे संवेदनशील गलियारे), तो 10 किमी से बाहर भी ESZ घोषित किया जा सकता है। |
| ESZ का उद्देश्य | नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र को मानव गतिविधियों के नकारात्मक प्रभाव से बचाना। |
| संक्रमण क्षेत्र की भूमिका | संरक्षित क्षेत्र के भीतर कड़ा संरक्षण → बाहर अपेक्षाकृत कम नियंत्रण (संतुलन बनाए रखना)। |
| स्थानीय लोगों पर प्रभाव | स्थानीय लोगों की दैनिक गतिविधियों में अनावश्यक बाधा न डालना। |
| मुख्य लक्ष्य | संरक्षित क्षेत्रों के आसपास के पर्यावरण को सुव्यवस्थित और सुरक्षित बनाना। |
| ESZ में निषिद्ध गतिविधियाँ | व्यावसायिक खनन, आरा मिलें, लकड़ी का व्यावसायिक उपयोग, वृक्षों की कटाई (नियंत्रित मामलों को छोड़कर)। |
| ESZ में अनुमत गतिविधियाँ | मौजूदा कृषि/बागवानी, वर्षा जल संचयन, जैविक खेती, अन्य गैर-हानिकारक गतिविधियाँ। |
| भारत में ESZ की संख्या | पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा अधिसूचित; 600 से अधिक ESZ देशभर में घोषित। |
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