अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2025: समावेशी विकास के लिए भारत का सहकारिता अभियान

अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2025 ऐसे समय में मनाया जा रहा है, जब समावेशी विकास और समुदाय-आधारित विकास को वैश्विक स्तर पर विशेष महत्व दिया जा रहा है। भारत ने इस अवसर का उपयोग करते हुए सुधारों, डिजिटलाइजेशन, नए संस्थानों और वित्तीय सहायता के माध्यम से अपने सहकारी पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत किया है, जिससे सहकारिता को जमीनी स्तर के आर्थिक विकास का एक प्रमुख स्तंभ बनाया गया है।

क्यों चर्चा में?

संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2025 को “अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष” घोषित किया है, जिसकी थीम है — “Cooperatives Build a Better World (सहकारिताएँ एक बेहतर विश्व का निर्माण करती हैं)”। भारत ने इस वैश्विक पहल के अनुरूप सहकारी क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों और सुधारों को प्रमुखता से प्रस्तुत किया है।

अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2025: वैश्विक परिप्रेक्ष्य

  • IYC 2025 का उद्देश्य 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति में सहकारिताओं की भूमिका को मान्यता देना है।
  • सहकारिताएँ साझा स्वामित्व और लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया को बढ़ावा देती हैं।
  • ये गरीबी, असमानता और टिकाऊ आजीविका जैसी चुनौतियों का समाधान करती हैं।
  • यह वर्ष सरकारों और संस्थानों को सहकारी उद्यमों को सशक्त करने के लिए प्रेरित करता है।
  • वैश्विक स्तर पर सहकारिताओं को जन-केंद्रित आर्थिक मॉडल के रूप में देखा जाता है, जो विकास और सामाजिक उत्तरदायित्व में संतुलन बनाते हैं।

भारत में सहकारी आंदोलन: पृष्ठभूमि

  • भारत की सहकारी सोच “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना से प्रेरित है और “सहकार से समृद्धि” नीति से सशक्त हुई है।
  • 1904 का कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटीज एक्ट इसका कानूनी आधार बना।
  • राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) और नाबार्ड (NABARD) जैसे संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
  • जुलाई 2021 में सहकारिता मंत्रालय के गठन से इस क्षेत्र को विशेष ध्यान मिला।
  • दिसंबर 2025 तक भारत में 8.5 लाख से अधिक सहकारिताएँ, लगभग 32 करोड़ सदस्यों को 30 क्षेत्रों में सेवाएँ दे रही हैं और लगभग सभी ग्रामीण क्षेत्रों को कवर करती हैं।

प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) को सशक्त बनाना

  • PACS ग्रामीण सहकारिता की रीढ़ हैं और इन्हें सुधारों व डिजिटलाइजेशन से मजबूत किया गया है।
  • मॉडल उपविधियों के तहत PACS अब 25 से अधिक व्यावसायिक गतिविधियाँ कर सकती हैं।
  • महिला एवं SC/ST प्रतिनिधित्व पर विशेष जोर।
  • 79,630 PACS को राष्ट्रीय ERP प्लेटफॉर्म पर कंप्यूटरीकरण की स्वीकृति।
  • अब तक 59,261 PACS ERP सॉफ्टवेयर का उपयोग कर रही हैं, 32,119 e-PACS बन चुकी हैं।
  • 34 करोड़ से अधिक डिजिटल लेन-देन, जिससे पारदर्शिता और दक्षता बढ़ी है।

बहुउद्देश्यीय और नई सहकारिताओं का विस्तार

  • गांव स्तर तक कवरेज सुनिश्चित करने के लिए नई सहकारिताओं को बढ़ावा दिया गया।
  • 32,009 नई PACS, डेयरी और मत्स्य सहकारिताएँ पंजीकृत।
  • PACS अब 2.55 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों में कार्यरत।
  • डेयरी सहकारिताएँ 87,159 ग्राम पंचायतों में और मत्स्य सहकारिताएँ लगभग 30,000 ग्राम पंचायतों में सक्रिय।
  • ये सहकारिताएँ स्थानीय सेवा केंद्र बनकर ऋण, बाजार और सरकारी योजनाओं तक पहुँच आसान बना रही हैं।

सरकारी योजनाओं के साथ एकीकरण

  • PACS को बहु-सेवा केंद्रों में बदला जा रहा है।
  • 38,000 से अधिक PACS को पीएम किसान समृद्धि केंद्र के रूप में उन्नत किया गया।
  • कई PACS कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) के रूप में भी कार्य कर रही हैं।
  • PACS स्तर पर विश्व की सबसे बड़ी विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण योजना लागू।
  • पायलट चरण में 112 PACS ने 68,702 मीट्रिक टन क्षमता के गोदाम पूरे किए, जिससे फसलोत्तर नुकसान कम हुआ।

राष्ट्रीय स्तर की सहकारी संस्थाएँ

  • तीन प्रमुख राष्ट्रीय सहकारिताएँ उत्पादन और निर्यात को मजबूती देती हैं।
  • नेशनल कोऑपरेटिव एक्सपोर्ट्स लिमिटेड ने 28 देशों में 13.77 लाख मीट्रिक टन का, ₹5,556 करोड़ मूल्य का निर्यात किया।
  • नेशनल कोऑपरेटिव ऑर्गेनिक्स लिमिटेड जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है और इसके 28 प्रमाणित उत्पाद हैं।
  • भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड “भारत बीज” ब्रांड के तहत बीज क्षेत्र को सशक्त बना रही है।
  • इनसे किसानों और सहकारिताओं की आय व बाजार पहुँच में सुधार हुआ है।

श्वेत क्रांति 2.0 और वित्तीय समावेशन

  • श्वेत क्रांति 2.0 का लक्ष्य पाँच वर्षों में दूध खरीद में 50% वृद्धि करना है।
  • 20,000 से अधिक नई डेयरी सहकारी समितियाँ पंजीकृत।
  • कोऑपरेटिव बैंक मित्र और RuPay किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से डिजिटल वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
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vikash

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