कज़ाख़स्तान (Kazakhstan) अब्राहम समझौते (Abraham Accords) में शामिल होने जा रहा है — यह अमेरिका की मध्यस्थता में तैयार एक ढांचा है, जिसका उद्देश्य इज़राइल और मुस्लिम-बहुल देशों के बीच संबंधों का सामान्यीकरण करना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 6 नवम्बर 2025 को इस घोषणा के साथ कज़ाख़स्तान को इस रणनीतिक साझेदारी में शामिल होने वाला नवीनतम देश बताया, जिसने 2020 से मध्य पूर्व की कूटनीति को नया रूप दिया है।
अब्राहम समझौते की शुरुआत 2020 में ट्रम्प प्रशासन के दौरान हुई थी।
इसके प्रारंभिक हस्ताक्षरकर्ता देश थे — संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को और सूडान।
इन समझौतों ने अरब–इज़राइल संबंधों में एक ऐतिहासिक बदलाव लाया, जहाँ पुराने राजनीतिक टकरावों की जगह कूटनीतिक, व्यापारिक और रणनीतिक सहयोग ने ले ली।
अब कज़ाख़स्तान की भागीदारी से यह समझौता अरब दुनिया से आगे बढ़कर मध्य एशिया में प्रवेश कर रहा है, जो भू-राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
यद्यपि कज़ाख़स्तान के पहले से ही इज़राइल के साथ राजनयिक और व्यापारिक संबंध हैं, लेकिन अब्राहम समझौते में शामिल होना एक प्रतीकात्मक और रणनीतिक कदम है।
इससे कज़ाख़स्तान अमेरिका समर्थित क्षेत्रीय पहल के और निकट आ जाएगा और मौजूदा सदस्य देशों के साथ बहुपक्षीय सहयोग बढ़ेगा।
कज़ाख़ सरकार ने कहा कि यह कदम उसके संवाद, पारस्परिक सम्मान और क्षेत्रीय स्थिरता पर केंद्रित विदेश नीति का “स्वाभाविक विस्तार” है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इसे “केवल कूटनीति से परे एक उन्नत साझेदारी” बताया, जो आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा सहयोग को नए स्तर पर ले जाएगी।
राष्ट्रपति ट्रम्प ने यह घोषणा C5+1 समूह (कज़ाख़स्तान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान) के नेताओं की व्हाइट हाउस में बैठक के बाद की।
यह अमेरिका की मध्य एशिया के देशों से बढ़ते जुड़ाव की रणनीति का हिस्सा है, जहाँ अब तक रूस और चीन का प्रभाव प्रमुख रहा है।
यह निर्णय ऐसे समय आया है जब गाज़ा संघर्ष के कारण अब्राहम समझौते का विस्तार ठहरा हुआ था।
कज़ाख़स्तान की भागीदारी से इस पहल को नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है, और अमेरिका अब उज़्बेकिस्तान व अज़रबैजान जैसे अन्य मुस्लिम-बहुल देशों से भी संपर्क बढ़ाने की योजना बना रहा है।
अब्राहम समझौते का विस्तार इस बात का प्रतीक है कि मुस्लिम-बहुल देशों की कूटनीति में नया युग शुरू हो रहा है, जहाँ आर्थिक विकास, क्षेत्रीय स्थिरता और आतंकवाद-रोधी सहयोग अब फलस्तीनी मुद्दे से जुड़ी पारंपरिक आपत्तियों पर भारी पड़ रहे हैं।
हालांकि, सऊदी अरब जैसे बड़े खिलाड़ी अब भी सतर्क हैं। उसने स्पष्ट किया है कि जब तक फलस्तीन को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देने का ठोस मार्ग नहीं बनता, वह सामान्यीकरण पर सहमत नहीं होगा।
बताया गया है कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) 18 नवम्बर को वॉशिंगटन की यात्रा पर जाएंगे, जिससे यह अटकलें बढ़ गई हैं कि क्या अब्राहम समझौते का और विस्तार संभव है।
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