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खुदरा महंगाई दर चार महीने के उच्चतम स्तर पर, दिसंबर में 5.69% पर पहुंची

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खुदरा मुद्रास्फीति दिसंबर में बढ़कर चार महीने के उच्च स्तर 5.69 प्रतिशत पर पहुंच गई, यह नवंबर में 5.55 प्रतिशत थी। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों में इसकी पुष्टि हुई है। वहीं औद्योगिक उत्पादन नवंबर में 2.4 प्रतिशत बढ़ा है। सरकार के आंकड़ों कें मुताबिक एक साल पहले इसी महीने में इसमें 7.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी। शुक्रवार को सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की ओर से महंगाई के आंकड़े जारी किए गए।

 

खुदरा महंगाई दर

खुदरा महंगाई दर दिसंबर महीने में भी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 2 से 6 प्रतिशत के सहिष्णुता बैंड के भीतर बनी हुई है। शुक्रवार को सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की ओर से महंगाई से जुड़े आंकड़े जारी किए गए। खुदरा महंगाई दर दिसंबर महीने में भी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 2 से 6 प्रतिशत के सहिष्णुता बैंड के भीतर बनी हुई है।

 

दिसंबर महीने में खाने-पीने की चीजें 9.53% महंगी हुईं

सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार क्रमिक आधार पर मुद्रास्फीति में शून्य से 0.32 प्रतिशत नीचे गिरावट दर्ज की गई। दिसंबर में खाद्य मुद्रास्फीति 9.53 प्रतिशत रही। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में मुद्रास्फीति की दर मामूली बढ़त के साथ क्रमशः 5.93 प्रतिशत व 5.46 प्रतिशत रही। एक साल पहले इसी महीने में यह 5.85 प्रतिशत और 5.26 प्रतिशत थी।

 

दिसंबर में सब्जियों की महंगाई बढ़कर 27.64% पर पहुंची

दिसंबर में सब्जियों की महंगाई दर बढ़कर 27.64 फीसदी हो गई, जो नवंबर में 17.7 फीसदी थी। इसके अलावा ईंधन और बिजली की मुद्रास्फीति में शुन्य से 0.99 प्रतिशत की गिरावट आयी जबकि एक साल पहले इसी महीने में इसमें शून्य से 0.77 प्रतिशत नीचे की गिरावट दर्ज की गई थी।

 

आरबीआई एमपीसी ने 2023-24 के लिए 5.4% रखा है महंगाई का अनुमान

दिसंबर की मौद्रिक नीति समीक्षा (MPC) में रिजर्व बैंक ने मुद्रास्फीति के लक्ष्य को 5.4 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा था। अगस्त की मौद्रिक नीति समीक्षा में रिजर्व बैंक एमपीसी ने वित्त वर्ष 2023-24 के लिए मुद्रास्फीति के अनुमान को 5.1 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.4 प्रतिशत कर दिया था।

 

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FAQs

मुद्रास्फीति से आप क्या समझते हैं?

मुद्रास्फीति के समय वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्यों में वृद्धि होती है। इसके कारण हमारे निर्यात महँगे हो जाएंगे तथा आयात सस्ते हो जाएंगे। नियार्त में कमी होगी तथा आयत में वृद्धि होगी जिसके कारण भुगतान संतुलन प्रतिकूल हो जाएगा। मुद्रास्फीति के कारण सरकार के सार्वजनिक व्यय में बहुत अधिक वृद्धि होती है।