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भारत ने झेला चरम मौसमी घटनाओं का दंश: बढ़ती मौतें और आर्थिक नुकसान

भारत में चरम मौसम की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हो रही है, जिसके मानव जीवन और अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव पड़ रहे हैं। हाल ही की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत वैश्विक स्तर पर चरम मौसम से होने वाली कुल मौतों में 10% का योगदान देता है, जिससे यह सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक बन गया है। 1993 से 2022 के बीच, भारत में 400 से अधिक चरम मौसम की घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें लगभग 80,000 लोगों की जान गई और अनुमानित आर्थिक नुकसान $180 अरब तक पहुंच गया। इन आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति ने देश की तैयारियों और प्रतिक्रिया क्षमताओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

भारत में चरम मौसम की घटनाएं क्यों बढ़ रही हैं?

भारत में मौसम की तीव्र घटनाएं जलवायु परिवर्तन से सीधे जुड़ी हुई हैं। बढ़ते वैश्विक तापमान ने अधिक गंभीर मानसून, लू (हीटवेव) और आकाशीय बिजली गिरने की घटनाओं को जन्म दिया है। अगस्त 2024 में, अत्यधिक मानसूनी बारिश ने उत्तरी राज्यों में भीषण बाढ़ लाई, जिससे भारी जनहानि और विस्थापन हुआ। इसी तरह, जुलाई 2024 में केरल में घातक भूस्खलन हुए, जिसमें 50 से अधिक लोग मारे गए। अप्रत्याशित मौसम परिवर्तन, वनों की कटाई और कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि इन घटनाओं के मुख्य कारण हैं। शोध बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण मानसूनी बारिश अधिक अनिश्चित और तीव्र होती जा रही है, जिससे बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं।

चरम मौसम की घटनाओं की मानव और आर्थिक लागत क्या है?

इन घटनाओं का प्रभाव बढ़ते हताहतों की संख्या में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वर्ष 2023 में, भारत में चरम मौसम के कारण 2,483 मौतें दर्ज की गईं, जबकि 2022 में यह संख्या 2,767 और 2021 में 1,944 थी। सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार शामिल हैं। अकेले मध्य प्रदेश में 2023 में 308 लोगों की मौत हुई, जिनमें से अधिकतर बिजली गिरने और बाढ़ के कारण हुई। बिहार में 263 मौतें दर्ज की गईं, जिनमें से 250 मौतें आकाशीय बिजली गिरने से हुईं। उत्तर प्रदेश में 273 लोगों की जान गई, जिनमें लू और बिजली गिरने जैसी घटनाएं प्रमुख कारण रहीं। आर्थिक रूप से भी इसका गहरा असर पड़ा है, जिससे बुनियादी ढांचे को नुकसान, कृषि हानि और लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हुई है।

क्या भारत जलवायु संकट से निपटने के लिए तैयार है?

गंभीर स्थिति के बावजूद, भारत जलवायु वित्तपोषण और नीतियों के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहा है। 29वें कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (COP29) में कमजोर देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में सहायता के लिए पर्याप्त वित्तीय प्रतिबद्धता नहीं मिल सकी। धन की इस कमी के कारण, भारत को बड़े पैमाने पर जलवायु शमन परियोजनाओं को लागू करने और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों में सुधार करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि तत्काल कदम उठाने की जरूरत है, जिसमें जलवायु-लचीले (क्लाइमेट-रेसिलिएंट) बुनियादी ढांचे में निवेश, आपदा प्रबंधन की बेहतर तैयारी और सख्त पर्यावरणीय नीतियों को अपनाना शामिल है। भविष्य के अनुमानों के अनुसार, 2050 तक लू की तीव्रता इतनी अधिक हो सकती है कि यह मानव अस्तित्व के लिए खतरा बन सकती है, जिससे त्वरित हस्तक्षेप और भी आवश्यक हो जाता है।

भारत में चरम मौसम की घटनाओं की चुनौती लगातार बढ़ रही है, और यदि निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो इसका मानव और आर्थिक नुकसान और भी बढ़ सकता है। जलवायु सहनशीलता को मजबूत करना, वैश्विक वित्तीय सहायता प्राप्त करना और टिकाऊ प्रथाओं को अपनाना देश को भविष्य की जलवायु आपदाओं से बचाने के लिए आवश्यक कदम हैं।

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