भारत ने नागोया प्रोटोकॉल (Nagoya Protocol) के तहत अपनी पहली राष्ट्रीय रिपोर्ट जैव विविधता पर अभिसमय (CBD) को सौंपी है। यह रिपोर्ट 27 फरवरी 2026 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) के सहयोग से प्रस्तुत की। इसमें 1 नवंबर 2017 से 31 दिसंबर 2025 तक भारत की प्रगति को दर्शाया गया है।
भारत में पहुँच और लाभ-साझाकरण (ABS) ढांचा जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत संचालित होता है। यह अधिनियम देश में जैव संसाधनों के प्रबंधन के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है। इस ढांचे को जैव विविधता नियम, 2024 और ABS Regulations, 2025 का समर्थन प्राप्त है, जो विभिन्न प्रशासनिक स्तरों पर प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करते हैं। साथ ही, यह प्रणाली एक तीन-स्तरीय संस्थागत संरचना का पालन करती है, जिसमें राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय स्तर पर भागीदारी सुनिश्चित कर जैव विविधता प्रबंधन को मजबूत बनाया जाता है।
भारत में नागोया प्रोटोकॉल के तहत ABS ढांचा एक सुव्यवस्थित संस्थागत प्रणाली के माध्यम से संचालित होता है। यह प्रणाली पूरे देश में जैव विविधता शासन को मजबूत बनाने के लिए बनाई गई है।
इस संरचना में राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय स्तर की संस्थाएं शामिल हैं। प्रमुख संस्थान इस प्रकार हैं:
भारत में अब तक 2,76,653 से अधिक जैव विविधता प्रबंधन समितियां (BMCs) स्थापित की जा चुकी हैं। ये समितियां स्थानीय समुदायों को जैव विविधता संरक्षण और लाभ-साझाकरण (Benefit Sharing) की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करती हैं।
भारत में नागोया प्रोटोकॉल के तहत ABS ढांचे के कार्यान्वयन से जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय समुदायों को महत्वपूर्ण वित्तीय लाभ प्राप्त हुए हैं। इस प्रक्रिया के तहत राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) की स्वीकृतियों से ₹216.31 करोड़ की राशि संचित की गई है।
इसके अलावा, ₹139.69 करोड़ की राशि लाभार्थियों—जिनमें स्थानीय समुदाय, किसान और पारंपरिक ज्ञान धारक शामिल हैं—को वितरित की गई है। वहीं, राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBBs) की स्वीकृतियों के माध्यम से ₹51.96 करोड़ की अतिरिक्त राशि भी उत्पन्न की गई है।
यह वित्तीय उपलब्धियां दर्शाती हैं कि भारत में ABS तंत्र न केवल जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि स्थानीय समुदायों के आर्थिक सशक्तिकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
नागोया प्रोटोकॉल एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसे वर्ष 2010 में जैव विविधता पर अभिसमय के तहत अपनाया गया था। यह समझौता आनुवंशिक संसाधनों (Genetic Resources) तक पहुंच (Access) और उनके उपयोग से प्राप्त लाभों के न्यायसंगत एवं समान वितरण (Access and Benefit Sharing – ABS) पर केंद्रित है। इस प्रोटोकॉल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब किसी देश या आदिवासी/स्थानीय समुदाय के जैव संसाधनों या पारंपरिक ज्ञान का उपयोग अनुसंधान, औषधि, कृषि या जैव प्रौद्योगिकी में किया जाए, तो उन्हें उचित लाभ प्राप्त हो। साथ ही, यह समझौता वैज्ञानिक नवाचार को बढ़ावा देते हुए सतत जैव विविधता संरक्षण को भी प्रोत्साहित करता है।
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