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भारत ने Israel के West Bank कदमों के खिलाफ 100+ देशों के साथ कड़ा रुख अपनाया

संयुक्त राष्ट्र में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम के तहत भारत ने उन सौ से अधिक देशों और वैश्विक संगठनों का साथ दिया है जो वेस्ट बैंक में इजरायल के ”एकतरफा” फैसलों की कड़ी निंदा कर रहे हैं। इन देशों का मानना है कि इजरायल के ये कदम वेस्ट बैंक में उसकी ‘अवैध उपस्थिति’ को बढ़ाने और क्षेत्र के विलय की कोशिशों का हिस्सा हैं। संयुक्त राष्ट्र में फलस्तीन के स्थायी पर्यवेक्षक मिशन द्वारा जारी एक संयुक्त बयान में इन देशों ने इजरायल की नीतियों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया।

संयुक्त बयान में क्या कहा गया है?

संयुक्त बयान में Israel के “एकतरफा निर्णयों और कदमों” की कड़ी निंदा की गई है और इन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध बताया गया है। इसमें ऐसे सभी कदमों को तुरंत वापस लेने की मांग की गई है और विलय (Annexation) के किसी भी प्रयास का स्पष्ट विरोध दोहराया गया है।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने खारिज किया:

  • 1967 से कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र की जनसांख्यिक संरचना में किसी भी प्रकार का बदलाव।
  • East Jerusalem के चरित्र और दर्जे में परिवर्तन से जुड़ी कार्रवाइयाँ।
  • क्षेत्र में चल रहे शांति प्रयासों को कमजोर करने वाले कदम।

बयान में आगे कहा गया कि ऐसे उपाय:

  • अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हैं।
  • शांति और स्थिरता को कमजोर करते हैं।
  • वार्ता के माध्यम से समाधान की संभावनाओं को खतरे में डालते हैं।

शुरुआत में 17 फरवरी को जारी इस बयान पर 85 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। भारत प्रारंभ में उनमें शामिल नहीं था, लेकिन बाद में जब हस्ताक्षरकर्ताओं की संख्या 100 से अधिक हो गई, तब भारत ने भी इसमें अपना समर्थन जोड़ा।

वेस्ट बैंक मुद्दा: पृष्ठभूमि

West Bank 1967 के छह-दिवसीय युद्ध के बाद से इज़राइल के नियंत्रण में है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय का अधिकांश हिस्सा इस क्षेत्र में इज़राइली बस्तियों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध मानता है, हालांकि इज़राइल इस व्याख्या से असहमत है।

बयान में निम्नलिखित के समर्थन की भी पुनः पुष्टि की गई:

  • United Nations के संबंधित प्रस्ताव।
  • 1991 की मैड्रिड शांति सम्मेलन रूपरेखा (Madrid terms of reference)।
  • 2002 की अरब शांति पहल (Arab Peace Initiative)।
  • “भूमि के बदले शांति” (Land for Peace) का सिद्धांत।

ये सभी ढांचे इज़राइल के साथ एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना का समर्थन करते हैं।

इज़राइल-फिलिस्तीन मुद्दे पर भारत की स्थिति

भारत ने ऐतिहासिक रूप से इज़राइल–फिलिस्तीन संघर्ष में संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है।

भारत के रुख के प्रमुख पहलू

  • भारत एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यवहार्य फिलिस्तीनी राज्य का समर्थन करता है।
  • वह सुरक्षित और मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर इज़राइल और फिलिस्तीन के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का पक्षधर है।
  • स्थायी शांति के लिए दो-राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) को ही एकमात्र व्यवहार्य मार्ग मानता है।
  • उल्लेखनीय रूप से, भारत 1988 में फिलिस्तीन राज्य को मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश था।

भारत के निर्णय का कूटनीतिक महत्व

संयुक्त बयान में शामिल होने का भारत का निर्णय कई कूटनीतिक संकेत देता है:

1. अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति प्रतिबद्धता:
इस बयान पर हस्ताक्षर कर भारत ने संयुक्त राष्ट्र आधारित बहुपक्षवाद और अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

2. पश्चिम एशिया में संतुलन:
भारत के इज़राइल और अरब देशों, विशेषकर खाड़ी देशों, के साथ मजबूत संबंध हैं, जो ऊर्जा और व्यापार के महत्वपूर्ण साझेदार हैं।

3. रणनीतिक स्वायत्तता:
यह कदम भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को दर्शाता है, जिसमें वह वैश्विक सहमति के साथ खड़ा होता है, लेकिन अपने द्विपक्षीय संबंधों को भी संतुलित बनाए रखता है।

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