अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ जंग छेड़ दी है। कई दिन बीतने के बावजूद यह लड़ाई अभी अंजाम तक नहीं पहुंची है। परमाणु हथियारों को लेकर इन देशों में तनातनी चरम पर है। रूस-यूक्रेन के अलावा अफगानिस्तान-पाकिस्तान में भी युद्ध चल रहा है। अटलांटिक काउंसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार 2035 से पहले तीसरा विश्व युद्ध छिड़ने के आसार हैं। इसमें परमाणु हथियारों का भी उपयोग किया जा सकता है।
एक्सपर्ट भी दुनिया के कई देशों में चल रहे युद्ध के और खतरनाक स्थिति में पहुंचने की संभावना जता रहे हैं। डूम्सडे क्लॉक (प्रलय की घड़ी) की ओर से इसी साल जनवरी में परमाणु युद्ध के खतरे को दर्शाने वाली रिपोर्ट जारी की गई थी। इसमें बताया गया था कि रूस-यूक्रेन युद्ध के तीसरे साल में भी न्यूक्लियर हथियारों के इस्तेमाल का खतरा है। कई देश पहली बार न्यूक्लियर हथियार का इस्तेमाल कर सकते हैं।
रेडिएशन इमरजेंसी मेडिकल मैनेजमेंट (आरईएमएम) के अनुसार 10-20 किलोटन के परमाणु विस्फोट में ग्राउंड ज़ीरो से 0.8 किमी के भीतर अत्यधिक गर्मी और विकिरण के कारण बचना लगभग असंभव है। 1.6-3.2 किमी की दूरी पर तत्काल चिकित्सा सहायता से जीवन बच सकता है। वहीं 6.4 किमी से अधिक दूरी पर विकिरण का खतरा न्यूनतम होता है।
परमाणु बम से बचने के लिए विस्फोट के केंद्र (Ground Zero) से कम से कम 10-15 किलोमीटर या उससे अधिक दूर होना चाहिए, ताकि तत्काल विनाशकारी गर्मी और शॉकवेव से बचा जा सके। हालाँकि, सुरक्षा दूरी बम की ताकत (किलोटन/मेगाटन) पर निर्भर करती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विस्फोट के तुरंत बाद, मजबूत कंक्रीट की इमारत के अंदर या तहखाने में छिपें।
नेचर की रिपोर्ट के मुताबिक परमाणु हमला होने के बाद ऑस्ट्रेलिया के लोग फिर से जीवन की शुरुआत करने में सक्षम होंगे। यहां की भौगोलिक स्थिति उनकी काफी मदद करेगी। ऑस्ट्रेलिया में गेहूं की काफी पैदावार होती है। इसी तरह न्यूजीलैंड के लोग न्यूक्लियर अटैक के बाद भी वातावरण संबंधी चुनौतियों से आसानी से निपट सकेंगे। दुनिया के अन्य देशों की तुलना में इन दोनों देशों के लोग जल्द ही नए जीवन की शुरुआत कर देंगे।
mea.gov.in के मुताबिक भारत ने साल 1998 में पोखरण में न्यूक्लियर टेस्ट किए थे। इसके बाद साल 2003 में अपनी न्यूक्लियर पॉलिसी बनाई। इसमें कहा गया कि भारत कभी भी पहले न्यूक्लियर हमला नहीं करेगा। इस पॉलिसी को नो फर्स्ट यूज (NFU) कहा जाता है। भारतीय न्यूक्लियर हथियार केवल अपनी सुरक्षा के लिए हैं। भारत के पास 3 तरह के न्यूक्लियर हथियार हैं। ये जमीन, समुद्र और हवा तीनों से हमला करने में सक्षम हैं।
परमाणु हमलों से निपटने के लिए BARC (Bhabha Atomic Research Centre) ने पूरे देश में एनवायर्नमेंटल रेडिएशन मॉनिटरिंग नेटवर्क (IERMON) बनाया है। इस नेटवर्क के देश भर में 25 स्टेशन हैं। ये इमरजेंसी कंट्रोल रूम को रेडिएशन लेवल के बारे में ऑनलाइन जानकारी देते हैं।
न्यूक्लियर मिसाइलें हमेशा से ही इंटरनेशनल लेवल पर लोगों का ध्यान खींचती रहीं हैं। जब भी किन्हीं 2 देशों में जंग छिड़ती है तो परमाणु हमलों को लेकर फिर से बहस शुरू हो जाती है। जनरल असेंबली के प्रस्तावों के अनुसार यूनाइटेड नेशंस (संयुक्त राष्ट्र) में मिसाइलों के मुद्दे पर काम करने वाले सरकारी एक्सपर्ट्स के 3 पैनल बनाए गए हैं। वहीं न्यूजीलैंड के विदेश मंत्रालय के मुताबिक दुनियाभर में परमाणु हथियारों की निगरानी और उनके दुरुपयोग को रोकने हेतु अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) (International Atomic Energy Agency) काम करती है।
इसके अतिरिक्त और भी कई व्यवस्थाएं मौजूद हैं जो मिसाइलों एवं उनसे जुड़ी टेक्नोलॉजी के फैलाव को रोकने की कोशिश करती हैं। इनमें खास तौर पर हेग कोड ऑफ कंडक्ट (HCOC) और मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) शामिल हैं।
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