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आर्थिक सर्वेक्षण: अर्थ, महत्व और हाइलाइट्स

आर्थिक सर्वेक्षण एक प्रमुख वार्षिक दस्तावेज है जो भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति की समीक्षा करता है। बजट पेश किए जाने से एक दिन पहले यह सर्वे संसद में पेश किया जाता है। हालांकि, संविधान न तो सरकार को आर्थिक सर्वेक्षण पेश करने के लिए बाध्य करता है और न ही सरकार इसकी सिफारिशों के साथ जाने के लिए बाध्य है। यह पूरी तरह से सरकार पर छोड़ दिया गया है कि वह आर्थिक सर्वेक्षण में दिए गए सुझावों को स्वीकार करेगी या अस्वीकार करेगी।

 

आर्थिक सर्वेक्षण 2022-23 की मुख्य बातें

 

  • भारत की अर्थव्यवस्था 2023-24 में 6.5% बढ़ने व इस वित्तीय वर्ष में 2021-22 में 8.7 फीसद की तुलना में 7 फीसद रहने का अनुमान है।
  • भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा।
  • सकल घरेलू उत्पाद नाममात्र के संदर्भ में अगले वित्त वर्ष में 11 फीसद होना चाहिए।
  • निजी खपत, उच्च कैपेक्स, कॉर्पोरेट बैलेंस शीट को मजबूत करने, छोटे व्यवसायों के लिए ऋण वृद्धि और शहरों में प्रवासी श्रमिकों की वापसी से विकास।
  • वैश्विक आर्थिक, राजनीतिक विकास के आधार पर अगले वित्तीय वर्ष में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि 6-6.8 फीसद की सीमा में होगी।
  • महामारी से भारत की रिकवरी अपेक्षाकृत तेज थी, अगले वित्त वर्ष में विकास को ठोस घरेलू मांग का समर्थन मिला, पूंजी निवेश में तेजी आई।
  • इस वित्त वर्ष में 6.8 फीसद मुद्रास्फीति का आरबीआई अनुमान ऊपरी लक्ष्य सीमा के बाहर, निजी खपत को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है, निवेश करने के लिए प्रलोभन को कमजोर करने के लिए भी बहुत कम नहीं है।

 

आर्थिक सर्वेक्षण क्या है?

आर्थिक सर्वेक्षण वित्त मंत्रालय द्वारा जारी की गई एक वार्षिक रिपोर्ट है। यह पिछले एक साल में देश के आर्थिक प्रगति और प्रदर्शन का लेखा -जोखा होता है। आर्थिक सर्वेक्षण में अर्थव्यवस्था से जुड़े सभी मुख्य आंकड़े पेश किए जाते हैं। इसमें अर्थव्यवस्था के मुख्य घटकों जैसे महंगाई दर, बुनियादी ढांचे, कृषि और विदेशी मुद्रा भंडार जैसे प्रमुख क्षेत्रों में रुझानों का विस्तृत विवरण दिया गया है। इसके साथ ही आर्थिक सर्वेक्षण में देश के सामने मौजूद आर्थिक चुनौतियों के बारे में बताया जाता है। इसे वित्त मंत्रालय का आर्थिक मामलों का विभाग मुख्य आर्थिक सलाहकार की देखरेख में तैयार करता है।

 

आर्थिक सर्वेक्षण का इतिहास

 

गौरतलब है कि आर्थिक सर्वेक्षण पेश करने का सिलसिला 1950 से जारी है। देश का पहला आर्थिक सर्वेक्षण 1950-51 में पेश किया गया था। 1964 से पहले ये बजट का हिस्सा होता था, लेकिन इसे अलग कर दिया गया और बजट से एक दिन पहले जारी किया जाने लगा। तब से लेकर अब तक यही पंरपरा चली आ रही है।

इसे दो भागों में बांटा जाता है। पहले में देश की वर्तमान आर्थिक स्थिति का पूरा विवरण दिया जाता है। दूसरे भाग स्वास्थ्य, गरीबी, जलवायु परिवर्तन और मानव विकास सूचकांक जैसे विभिन्न मुद्दों पर केंद्रित होता है।

 

बजट से पहले क्यों पेश किया जाता है

 

सर्वेक्षण प्रमुख इनपुट प्रदान करता है जो बजट बनाने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि यह पिछले वित्तीय वर्ष के आर्थिक विकास का विस्तृत विश्लेषण प्रदान करता है, यह बजट के लिए संदर्भ निर्धारित करता है।

सर्वेक्षण को वर्ष 1964 में बजट से अलग कर दिया गया था और अग्रिम रूप से परिचालित किया गया था ताकि बजट का संदर्भ प्रदान किया जा सके। इस तरह यह बजट प्रस्तावों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है।

 

मोदी सरकार के लिए महत्वपूर्ण है Budget 2023

 

इस बार के बजट पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं। इसका कारण ये है कि 2024 के आम चुनाव से पहले पेश होने वाला ये सरकार का आखिरी पूर्ण बजट है। ऐसे में अब जबकि कोरोना का प्रकोप भी लगभग खत्म हो चुका है, तो इसके लोकलुभावन होने की उम्मीद जताई जा रहा है। Budget 2023 वित्त मंत्री के रूप में Nirmala Sitharaman का लगातार 5वां बजट होगा।

 

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vikash

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