रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ), जो रक्षा मंत्रालय (MoD) के अधीन कार्य करता है, ने 1 जनवरी 2026 को नई दिल्ली स्थित डीआरडीओ मुख्यालय में अपना 68वाँ स्थापना दिवस मनाया। यह अवसर भारत की रक्षा और सुरक्षा अवसंरचना के निर्माण में डीआरडीओ के लगभग सात दशकों के असाधारण योगदान को रेखांकित करता है। इस समारोह में केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राज्य मंत्री संजय सेठ तथा डीआरडीओ के अध्यक्ष और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव डॉ. समीर वी. कामत की गरिमामयी उपस्थिति रही। उनकी उपस्थिति ने आत्मनिर्भर भारत—भारत की स्वावलंबी रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र—को आगे बढ़ाने में डीआरडीओ की उपलब्धियों और भविष्य की दिशा के राष्ट्रीय महत्व को उजागर किया।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुख्य तथ्य (Key Facts)
- कार्यक्रम: डीआरडीओ का 68वाँ स्थापना दिवस
- तिथि: 01 जनवरी 2026
- स्थान: डीआरडीओ मुख्यालय, नई दिल्ली
- स्थापना: 01 जनवरी 1958 (68 वर्ष पूर्ण)
- अध्यक्ष: डॉ. समीर वी. कामत
- वर्तमान नेटवर्क: 52 प्रयोगशालाएँ (शुरुआत में 10)
- मुख्य फोकस क्षेत्र: साइबर, अंतरिक्ष (Space) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)
- AoN (Acceptance of Necessity) स्वीकृतियाँ:
- 22 स्वीकृतियाँ, कुल मूल्य लगभग ₹1.30 लाख करोड़
रक्षा अनुबंध:
- 11 रक्षा अनुबंध, कुल मूल्य ₹26,000 करोड़
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (LAToT):
- वर्ष 2025 में 245
- कुल अब तक: 2,201
उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence – CoE):
- 15 क्रियाशील
- 66 नई परियोजनाएँ, कुल मूल्य ₹228 करोड़
डीआरडीओ की रणनीतिक दृष्टि: आत्मनिर्भर भारत
डीआरडीओ को रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भर भारत अभियान की एक प्रमुख धुरी के रूप में पुनः स्थापित किया गया है। यह संगठन भारत के रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाने में निरंतर अग्रणी भूमिका निभा रहा है, जिसमें भविष्य की रणनीतिक प्राथमिकता तीन महत्वपूर्ण क्षेत्रों—साइबर, अंतरिक्ष (Space) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)—पर केंद्रित है। यह दूरदर्शी दृष्टिकोण भारत को उभरती सुरक्षा चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने में सक्षम बनाता है और साथ ही विदेशी रक्षा प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता को कम करने में सहायक है।
खरीद एवं वित्तीय उपलब्धियाँ: रिकॉर्ड उपलब्धियाँ
स्वीकृति की आवश्यकता (Acceptance of Necessity – AoN) अनुमोदन
रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) और रणनीतिक नीति बोर्ड (SPB) द्वारा कुल 22 स्वीकृति की आवश्यकता (AoN) को मंज़ूरी प्रदान की गई, जिनका कुल मूल्य लगभग ₹1.30 लाख करोड़ (₹1,30,000 करोड़) है। ये अनुमोदन भारतीय उद्योग को महत्वपूर्ण रक्षा प्रणालियों के उत्पादन में सक्षम बनाते हैं तथा निजी क्षेत्र और रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (DPSUs) को स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकियों के विकास और निर्माण का अवसर प्रदान करते हैं।
रक्षा अनुबंध और सिस्टम्स का समावेशन
डीआरडीओ ने अपने उत्पादन भागीदारों के साथ कुल 11 रक्षा अनुबंध किए, जिनकी कुल कीमत ₹26,000 करोड़ है, जिससे इसकी परिचालन क्षमता और प्रभाव क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। इसके अतिरिक्त, डीआरडीओ द्वारा विकसित कई प्रणालियों को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs), राज्य पुलिस बलों तथा राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) में शामिल किया गया है। इससे डीआरडीओ की परिचालन पहुँच पारंपरिक भारतीय सशस्त्र बलों से आगे बढ़कर आंतरिक सुरक्षा और आपदा प्रबंधन क्षेत्रों तक विस्तारित हुई है।
अनुसंधान, विकास और परीक्षण: परिचालन प्रगति
उपयोगकर्ता मूल्यांकन परीक्षण (User Evaluation Trials – UETs)
डीआरडीओ ने कई महत्वपूर्ण प्रणालियों के लिए उपयोगकर्ता मूल्यांकन परीक्षण (UETs) पूरे कर लिए हैं या वे अंतिम चरण में हैं। इनमें प्रमुख रूप से प्रलय, आकाश नेक्स्ट जेनरेशन (आकाश-NG), गाइडेड पिनाका, मैन पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (MPATGM), एडवांस्ड लाइटवेट टॉरपीडो (ALWT), बैटलफील्ड ऑब्ज़र्वेशन सर्विलांस सिस्टम (BOSS), स्पेशलाइज़्ड डिमोलिशन रोबोट (SDR) तथा रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और न्यूक्लियर (CBRN) जल प्रणालियाँ शामिल हैं। यह प्रगति इन प्रणालियों की परिचालन तत्परता और शीघ्र समावेशन की दिशा में डीआरडीओ के सशक्त प्रयासों को दर्शाती है।
चल रहे विकासात्मक परीक्षण (Ongoing Developmental Trials)
डीआरडीओ द्वारा कई अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों के विकासात्मक परीक्षण सक्रिय रूप से जारी हैं। इनमें प्रमुख रूप से भारतीय लाइट टैंक, वेरी शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (VSHORADS), न्यू एयर-टू-सर्फेस मिसाइल – शॉर्ट रेंज (NASM-SR), रुद्रम-2, गौरव ग्लाइड बम, उन्नत रडार प्रणालियाँ, तथा लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) के लाइफ सपोर्ट सिस्टम शामिल हैं। ये परीक्षण भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
उद्योग एवं अकादमिक साझेदारी: पारिस्थितिकी तंत्र का सशक्तिकरण
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में नेतृत्व
डीआरडीओ ने केवल वर्ष 2025 में ही 245 लाइसेंसिंग एग्रीमेंट्स (LAToT) पर हस्ताक्षर किए, जिससे कुल संख्या बढ़कर 2,201 हो गई। यह उपलब्धि रक्षा प्रौद्योगिकी के लोकतंत्रीकरण और भारतीय उद्योग को स्वदेशी क्षमताएँ विकसित करने में सक्षम बनाने के प्रति डीआरडीओ की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
उद्योग सहयोग
वर्ष 2025 में 13 नई डिफेंस कॉरिडोर प्रोडक्शन/प्रोडक्शन एजेंसी (DcPP/PA) साझेदारियाँ जोड़ी गईं, जिससे इनकी कुल संख्या 145 हो गई। इसके अतिरिक्त, निजी क्षेत्र और रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (DPSUs) के लिए 4,000 से अधिक उद्योग परीक्षण किए गए, जिससे एक मजबूत नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा मिला।
उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence – CoE)
वर्तमान में उद्योग–अकादमिक 15 उत्कृष्टता केंद्र (CoE) क्रियाशील हैं। वर्ष 2025 में 66 नई परियोजनाओं को मंज़ूरी दी गई, जिनका कुल मूल्य ₹228 करोड़ है। ये केंद्र अकादमिक अनुसंधान और औद्योगिक अनुप्रयोगों के बीच सेतु का कार्य कर रहे हैं।
डीआरडीओ की ऐतिहासिक स्थापना और विकास
डीआरडीओ की स्थापना 1 जनवरी 1958 को तकनीकी विकास प्रतिष्ठान, भारतीय आयुध कारखानों के तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय तथा रक्षा विज्ञान संगठन के विलय के माध्यम से की गई थी। स्थापना के समय डीआरडीओ के पास केवल 10 प्रयोगशालाओं का नेटवर्क था, जो समय के साथ निरंतर विस्तार करते हुए आज 52 प्रयोगशालाओं तक पहुँच चुका है। अपने गठन के बाद से डीआरडीओ ने रक्षा अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है और आज यह संगठन वैश्विक स्तर पर एक अग्रणी रक्षा अनुसंधान संस्थान के रूप में स्थापित हो चुका है।


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