रानी वेलु नाचियार तमिलनाडु की एक साहसी और दूरदर्शी शासिका थीं, जिन्होंने 1857 के विद्रोह से बहुत पहले ही ब्रिटिश विस्तार के खिलाफ संघर्ष किया। वर्ष 1730 में जन्मी रानी वेलु नाचियार प्रतिरोध, वीरता और महिला नेतृत्व की प्रतीक बनीं। 3 जनवरी को उनकी जयंती पर उन्हें शिवगंगई राज्य को पुनः प्राप्त करने और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध निडर संघर्ष के लिए स्मरण किया जाता है।
प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि
- 1730 में जन्म, रामनाथपुरम के शाही परिवार में
- रामनाड (रामनाथपुरम) राज्य के शासक की पुत्री
- मार्शल आर्ट, घुड़सवारी और हथियारों का प्रशिक्षण
- उच्च शिक्षित, कई भाषाओं में निपुण
- शिवगंगई राज्य के शासक से विवाह
उनकी राजसी परवरिश और शिक्षा ने उन्हें उस दौर में नेतृत्व और कूटनीति के लिए तैयार किया, जब राजनीतिक परिस्थितियाँ अत्यंत चुनौतीपूर्ण थीं।
ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष
- पति की मृत्यु के बाद राज्य खो दिया
- ईस्ट इंडिया कंपनी ने शिवगंगई पर नियंत्रण बढ़ाया
- मैसूर के हैदर अली से सहयोग प्राप्त किया
- गोपाल नायकर के साथ मिलकर सैन्य रणनीतियाँ बनाई
- ब्रिटिश सेनाओं को पराजित कर राज्य पुनः प्राप्त किया
वे ब्रिटिशों के विरुद्ध सक्रिय युद्ध करने वाली पहली भारतीय रानी बनीं, जिसने उनकी रणनीतिक कुशलता को उजागर किया।
नवोन्मेषी युद्ध नीति और नेतृत्व
- महिला सैनिकों सहित सेना का गठन
- ब्रिटिशों के खिलाफ अपरंपरागत युद्ध रणनीतियाँ अपनाईं
- शत्रु को कमजोर करने के लिए साहसी अभियानों का समर्थन
- युद्ध में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहन
- समावेशी और प्रगतिशील सैन्य नेतृत्व का प्रदर्शन
प्रशासन और शासन व्यवस्था
- संप्रभुता और क्षेत्रीय स्वायत्तता की रक्षा पर जोर
- सत्ता पुनः प्राप्ति के बाद स्थानीय प्रशासन को सुदृढ़ किया
- शिवगंगई राज्य में स्थिरता और जनकल्याण सुनिश्चित किया
- जनता में एकता और निष्ठा को बढ़ावा दिया
- कूटनीति और सैन्य शक्ति के बीच संतुलन बनाए रखा
- उनका शासन साहस, सुशासन और जन-केंद्रित नेतृत्व का उत्कृष्ट उदाहरण था।
विरासत और ऐतिहासिक महत्व
- तमिल समाज में “वीरमंगई” (साहसी महिला) के नाम से प्रसिद्ध
- भारत में औपनिवेशिक विरोध की शुरुआती प्रतीकों में से एक
- भावी स्वतंत्रता सेनानियों और समाज सुधारकों को प्रेरणा
- महिला सशक्तिकरण की अग्रदूत के रूप में स्मरणीय
- इतिहास, साहित्य और जनस्मृति में सम्मानित
रानी वेलु नाचियार आज भी प्रतिरोध, साहस और राष्ट्रीय गौरव की एक अमिट प्रतीक बनी हुई हैं।


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