आचार्य देवव्रत को महाराष्ट्र के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार मिला

गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत को महाराष्ट्र के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। यह कदम सी. पी. राधाकृष्णन के भारत के उपराष्ट्रपति चुने जाने के बाद उठाया गया, क्योंकि वे पहले महाराष्ट्र के राज्यपाल थे और उपराष्ट्रपति पद संभालने के लिए उन्होंने अपना पद छोड़ दिया।

भारत के राष्ट्रपति ने संवैधानिक प्रावधानों के तहत आचार्य देवव्रत को महाराष्ट्र का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा है, ताकि राज्य में संवैधानिक और कार्यकारी कार्य बिना रुकावट जारी रह सकें।

बदलाव क्यों आवश्यक था?

  • 9 सितम्बर 2025 को हुए उपराष्ट्रपति चुनाव में सी. पी. राधाकृष्णन की जीत हुई।

  • वे उस समय महाराष्ट्र के राज्यपाल थे और उपराष्ट्रपति पद ग्रहण करते ही उन्होंने अपना गवर्नर पद छोड़ दिया।

  • इससे महाराष्ट्र राजभवन में रिक्ति हो गई।

  • इस संवैधानिक शून्य से बचने के लिए राष्ट्रपति ने आचार्य देवव्रत को अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी।

  • ऐसे अंतरिम प्रबंध भारतीय संविधान में सामान्य और स्वीकार्य हैं।

आचार्य देवव्रत: संक्षिप्त परिचय

  • जन्म: 1959

  • वर्तमान: 22 जुलाई 2019 से गुजरात के राज्यपाल

  • पूर्व में: हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल (2015–2019)

  • विशेष योगदान:

    • प्राकृतिक खेती और पर्यावरण संरक्षण के प्रबल समर्थक

    • बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, नशा मुक्ति अभियान, गौ संरक्षण और वृक्षारोपण जैसी सामाजिक पहलों में सक्रिय भागीदारी

  • विभिन्न राज्यों में प्रशासनिक अनुभव होने से वे दोहरी जिम्मेदारी निभाने के लिए उपयुक्त माने जाते हैं।

संवैधानिक प्रावधान

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 153: प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा।

  • प्रावधान: एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है, स्थायी या अस्थायी तौर पर।

  • इसी आधार पर राष्ट्रपति ने आचार्य देवव्रत को महाराष्ट्र का कार्यवाहक राज्यपाल नियुक्त किया।

अवसर और चुनौतियाँ

  • गुजरात और महाराष्ट्र दोनों बड़े राज्य हैं, ऐसे में दोहरी जिम्मेदारी निभाना चुनौतीपूर्ण होगा।

  • अधिकांश कार्य राजभवन कार्यालय और स्टाफ के जरिए पूरे हो सकते हैं, लेकिन कुछ कार्यों (जैसे विधान पर हस्ताक्षर, औपचारिक कार्यक्रम) के लिए व्यक्तिगत उपस्थिति आवश्यक हो सकती है।

  • यह अवसर भी है कि गुजरात और महाराष्ट्र साझा विकास लक्ष्यों (विशेषकर कृषि, जल संरक्षण और ग्रामीण कल्याण) पर मिलकर कार्य कर सकें।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • आचार्य देवव्रत: गुजरात के राज्यपाल, अब महाराष्ट्र के राज्यपाल का भी अतिरिक्त प्रभार।

  • संविधान में संबंधित अनुच्छेद: अनुच्छेद 153 से 167 (भाग VI – राज्य कार्यपालिका)।

  • अनुच्छेद 153: प्रत्येक राज्य के लिए राज्यपाल होगा, परंतु एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल भी हो सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तराखंड बाढ़ के लिए 1,200 करोड़ रुपये की सहायता की घोषणा की

उत्तराखंड में बादल फटने, लगातार बारिश और भूस्खलन से हुई भीषण तबाही के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देहरादून में स्थिति की उच्चस्तरीय समीक्षा की और राज्य के लिए ₹1,200 करोड़ का राहत पैकेज घोषित किया। यह सहायता पैकेज आपदा प्रभावित लोगों और बुनियादी ढाँचे के पुनर्निर्माण के लिए जीवनरेखा साबित होगा।

बहुआयामी राहत रणनीति

प्रधानमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड को केवल तात्कालिक राहत ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक पुनर्वास और लचीलापन (resilience) सुनिश्चित करने के लिए बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है।

राहत पैकेज की प्रमुख बातें:

  • प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के अंतर्गत प्रभावित घरों का पुनर्निर्माण

  • राष्ट्रीय राजमार्गों की बहाली, जो परिवहन और पर्यटन के लिए आवश्यक हैं

  • प्रभावित क्षेत्रों में स्कूलों और सामुदायिक ढाँचे का पुनर्निर्माण

  • प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) से तात्कालिक सहायता

  • ग्रामीण आजीविका बचाने के लिए पशुपालकों को मिनी किट का वितरण

प्रभावित परिवारों के लिए सीधी आर्थिक सहायता

  • मृतकों के परिजनों को ₹2 लाख अनुग्रह राशि (Ex-gratia)

  • गंभीर रूप से घायलों को ₹50,000 की आर्थिक सहायता

ये सहायता राशि आपदा से पीड़ित परिवारों को तत्काल वित्तीय स्थिरता प्रदान करने के उद्देश्य से दी जाएगी।

अनाथ बच्चों के लिए PM CARES से सहयोग

आपदा में माता-पिता खो चुके बच्चों के लिए प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि उनकी देखभाल PM CARES for Children योजना के तहत होगी। इसमें शामिल है:

  • दीर्घकालिक वित्तीय और शैक्षणिक सहायता

  • स्वास्थ्य सेवा और आवास की व्यवस्था

  • सुरक्षित और सहयोगी वातावरण में उनका पुनर्वास

याद रखने योग्य तथ्य

  • घटना: उत्तराखंड में बाढ़ और भूस्खलन, पीएम द्वारा समीक्षा

  • घोषित सहायता: ₹1,200 करोड़ का पैकेज

  • मुख्य योजनाएँ शामिल:

    • प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) – घरों का पुनर्निर्माण

    • पीएमएनआरएफ (PMNRF) – तात्कालिक राहत

    • पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन – अनाथ बच्चों के लिए सहयोग

सेबी की मंजूरी के साथ श्रीनिवास इंजेती को एनएसई गवर्निंग बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया

भारत के वित्तीय नियामकीय ढाँचे में एक अहम बदलाव करते हुए सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी श्रीनिवास इन्जेटी को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के गवर्निंग बोर्ड का चेयरपर्सन नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) की मंजूरी से हुई है, जो एशिया के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंजों में से एक में सुशासन और पारदर्शिता को और मजबूत करने की दिशा में एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है।

विशिष्ट प्रशासनिक करियर

  • श्रीनिवास इन्जेटी, 1983 बैच के आईएएस अधिकारी, के पास वित्तीय सेवाओं, कॉर्पोरेट गवर्नेंस, नियामकीय सुधार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में चार दशकों से अधिक का अनुभव है।

  • कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय के सचिव रहते हुए उन्होंने कंपनी कानून, दिवाला समाधान तंत्र और कॉर्पोरेट गवर्नेंस ढाँचे में ऐतिहासिक सुधार लागू किए।

  • उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के कार्यान्वयन की अगुवाई करना था, जिसने भारत में संकटग्रस्त कंपनियों के निपटारे का तरीका बदल दिया।

आईएफएससीए के प्रथम चेयरपर्सन

  • इन्जेटी को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (IFSCA) का पहला चेयरपर्सन नियुक्त किया गया था।

  • उनके नेतृत्व में आईएफएससीए ने अहम कदम उठाए:

    • गिफ्ट सिटी में वैश्विक बैंकिंग और बीमा संचालन को बढ़ावा

    • फिनटेक नवाचार को प्रोत्साहन

    • ग्रीन और सस्टेनेबल फाइनेंस की पहल

  • उनकी दृष्टि ने भारत के गिफ्ट आईएफएससी को एक प्रतिस्पर्धी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद की।

व्यापक प्रशासनिक और नियामकीय अनुभव

  • खेल सचिव के रूप में खेल नीति और प्रशासनिक सुधारों की देखरेख की।

  • राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) के चेयरमैन रहते हुए आवश्यक दवाओं की किफायती उपलब्धता सुनिश्चित की।

  • संयुक्त राष्ट्र (UN) असाइनमेंट में वैश्विक शासन और विकास लक्ष्यों में योगदान दिया।

  • SEBI, LIC और अन्य प्रमुख संस्थानों के बोर्ड में सदस्य के रूप में कार्य किया।

यह विविध अनुभव उन्हें एनएसई में संतुलित और पारदर्शी निगरानी प्रदान करने में सक्षम बनाता है, जिससे निवेशकों का भरोसा और जनहित दोनों मजबूत होंगे।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • श्रीनिवास इन्जेटी – एनएसई गवर्निंग बोर्ड के नए चेयरपर्सन।

  • 1983 बैच के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी, 40 वर्षों से अधिक का अनुभव।

  • पूर्व में – कॉर्पोरेट कार्य सचिव और आईएफएससीए के प्रथम चेयरपर्सन।

  • SEBI – भारतीय प्रतिभूति बाजार की नियामक संस्था।

    • गठन: 1988 (गैर-वैधानिक रूप में)

    • वैधानिक अधिकार: SEBI अधिनियम, 1992 के तहत प्रदान किए गए।

कैबिनेट ने भागलपुर-दुमका-रामपुरहाट रेल लाइन के दोहरीकरण को मंजूरी दी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10 सितम्बर 2025 को भागलपुर–दुमका–रामपुरहाट रेलवे लाइन (177 किमी) को दोगुना करने की मंज़ूरी दी। बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर गुजरने वाली इस परियोजना की लागत लगभग ₹3,169 करोड़ होगी। इसका उद्देश्य रेल संपर्क मज़बूत करना, माल ढुलाई बढ़ाना और पिछड़े व आकांक्षी जिलों में विकास को प्रोत्साहित करना है।

परियोजना के प्रमुख उद्देश्य व लाभ

  • पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के तहत बहु-आयामी संपर्क और लॉजिस्टिक्स दक्षता सुनिश्चित करना।

  • एकल लाइन पर भीड़भाड़ कम होगी।

  • माल व यात्रियों की आवाजाही तेज़ और समयनिष्ठ होगी।

  • उद्योगों के लिए लॉजिस्टिक्स लागत घटेगी।

28.72 लाख लोगों और 441 गाँवों को लाभ

  • पाँच जिलों के 28.72 लाख लोग और 441 गाँव सीधे लाभान्वित होंगे।

  • इसमें नीति आयोग द्वारा चिन्हित 3 आकांक्षी जिले भी शामिल : बांका, गोड्डा और दुमका

  • मार्ग से जुड़े धार्मिक स्थलों को बढ़ावा मिलेगा :

    • देवघर (बाबा बैद्यनाथ धाम), झारखंड

    • तारापीठ शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल

माल ढुलाई क्षमता और पर्यावरणीय प्रभाव

  • दोगुनीकरण के बाद अतिरिक्त 15 मिलियन टन प्रतिवर्ष (MTPA) माल ढुलाई की क्षमता।

  • प्रमुख वस्तुएँ : कोयला, सीमेंट, उर्वरक, ईंट-पत्थर

  • हरित अवसंरचना में योगदान :

    • तेल आयात में 5 करोड़ लीटर की बचत

    • 24 करोड़ किग्रा CO₂ उत्सर्जन में कमी

    • 1 करोड़ पेड़ लगाने के बराबर पर्यावरणीय लाभ

स्थायी तथ्य एवं मुख्य बिंदु

  • अनुमोदन तिथि : 10 सितम्बर 2025

  • दूरी : 177 किमी

  • कुल लागत : ₹3,169 करोड़

  • राज्य : बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल

  • जिले : बांका, गोड्डा, दुमका आदि

  • धार्मिक स्थल जुड़े : देवघर (झारखंड), तारापीठ (प. बंगाल)

प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना (PMMSY) के पाँच वर्ष : उपलब्धियाँ और प्रभाव

10 सितम्बर 2020 को प्रारम्भ हुई प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना (PMMSY) ने पाँच वर्षों में भारत के मत्स्य क्षेत्र को एक पर्यावरणीय रूप से स्थायी, आर्थिक रूप से सशक्त और सामाजिक रूप से समावेशी उद्योग के रूप में पुनर्गठित किया है। इस योजना को 2025–26 तक उसी वित्तीय संरचना के साथ विस्तार दिया गया है, जिससे “नीली क्रांति” को और अधिक गहराई प्रदान की जा सके। योजना का मुख्य उद्देश्य उत्पादन, गुणवत्ता, प्रौद्योगिकी तथा पश्च-फसल अवसंरचना में विद्यमान अंतरालों को दूर करना है।

उल्लेखनीय उपलब्धियाँ

  • मत्स्य उत्पादन : 2024–25 में कुल उत्पादन 195 लाख टन, जो 2013–14 की तुलना में 104% अधिक है।

  • आंतरिक मत्स्य क्षेत्र : इसी अवधि में 142% की वृद्धि।

  • वैश्विक स्थिति : भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक बन चुका है।

  • निर्यात : मत्स्य निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि से वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि हुई है।

वित्तीय प्रतिबद्धताएँ एवं अवसंरचना विकास

  • राज्यों व एजेंसियों के लिए अब तक ₹21,274 करोड़ मूल्य की परियोजनाएँ स्वीकृत।

  • ₹9,189 करोड़ केंद्रीय अंश में से ₹5,587 करोड़ व्यय हेतु जारी।

  • मत्स्य बंदरगाहों, कोल्ड स्टोरेज तथा बाजार अवसंरचना हेतु ₹17,210 करोड़ का आवंटन।

  • पीएम-मत्य्स किसान समृद्धि सह-योजना (PM-MKSSY) वर्ष 2024 में ₹6,000 करोड़ बजट के साथ प्रारम्भ, जिसका उद्देश्य क्षेत्र का औपचारिककरण, बीमा विस्तार और मूल्य श्रृंखला सुदृढ़ करना है।

मछुआरों का सशक्तिकरण एवं डिजिटल आधार

  • 26 लाख मछुआरे, उद्यमी और FFPOs राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म (NFDP) पर पंजीकृत।

  • 4.76 लाख किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) मछुआरों व मत्स्य कृषकों को प्रदान।

  • ₹3,214 करोड़ की राशि ऋण एवं वित्तीय सहायता के रूप में वितरित।

  • प्रशिक्षण, सहकारी संस्थाओं और विपणन अवसरों पर विशेष बल, जिससे क्षेत्र में दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित हो सके।

स्थायी तथ्य एवं मुख्य बिंदु

  • योजना प्रारम्भ : 10 सितम्बर 2020

  • निष्पादन मंत्रालय : मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय

  • लक्ष्य अवधि : 2025–26 तक विस्तार

  • स्वीकृत परियोजनाएँ : ₹21,274 करोड़ (2025 तक)

  • प्रमुख उप-योजना : PM-MKSSY, ₹6,000 करोड़ (2024)

  • उत्पादन (2024–25) : 195 लाख टन (2013–14 से 104% वृद्धि)

  • वैश्विक स्थान : विश्व में दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक देश

जनजातीय कार्य मंत्रालय ने आदि संस्कृति डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म लॉन्च किया

भारत की जनजातीय कला एवं संस्कृति को सहेजने और वैश्विक मंच पर पहुँचाने के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय ने 10 सितम्बर 2025 को भारत मंडपम, नई दिल्ली में राष्ट्रीय सम्मेलन – आदि कर्मयोगी अभियान के अवसर पर आदि संस्कृति (Beta Version) का शुभारंभ किया। इसका उद्घाटन श्री दुर्गादास उइके, राज्य मंत्री, जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा किया गया। यह पहल दुनिया का पहला जनजातीय संस्कृति के लिए डिजिटल विश्वविद्यालय (Digital University) मानी जा रही है।

इसका उद्देश्य केवल परंपराओं का संरक्षण ही नहीं, बल्कि जनजातीय शिल्पकारों को वैश्विक बाज़ारों से जोड़कर आजीविका भी सुनिश्चित करना है।

आदि संस्कृति के तीन स्तंभ

  1. आदि विश्वविद्यालय (Adi Vishwavidyalaya)

    • 45 डिजिटल पाठ्यक्रम (नृत्य, संगीत, चित्रकला, हस्तशिल्प, लोककथाएँ)।

    • दुनिया भर के विद्यार्थियों के लिए ऑनलाइन जनजातीय परंपराओं का अनुभव।

  2. आदि संपदा (Adi Sampada)

    • 5,000+ डिजिटल दस्तावेज़, पाँच थीमों में : नृत्य, चित्रकला, वस्त्र, कलाकृतियाँ, और आजीविका।

    • भारत की जनजातीय धरोहर को सहेजने और प्रदर्शित करने वाला डिजिटल अभिलेखागार

  3. आदि हाट (Adi Haat)

    • शुरुआत में TRIFED से जुड़ा, आगे चलकर स्वतंत्र ई-मार्केटप्लेस बनेगा।

    • उपभोक्ताओं को सीधे जनजातीय शिल्पकारों के उत्पाद उपलब्ध कराएगा, जिससे सतत आय संभव होगी।

जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRIs) के साथ साझेदारी

यह पहल राज्य स्तरीय TRIs के सहयोग से चलाई जा रही है ताकि प्रामाणिकता और स्थानीय भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

पहला चरण : 15 राज्यों से योगदान – आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश आदि।
इन राज्यों ने जनजातीय कला-रूपों का डिजिटलीकरण और दस्तावेज़ीकरण उपलब्ध कराया है।

स्थिर तथ्य एवं मुख्य बिंदु

  • शुभारंभ: 10 सितम्बर 2025, भारत मंडपम, नई दिल्ली

  • लॉन्चिंग संस्थान: जनजातीय कार्य मंत्रालय

  • घोषणा करने वाले: श्री दुर्गादास उइके, राज्य मंत्री

  • मुख्य घटक:

    • आदि विश्वविद्यालय – 45 पाठ्यक्रम

    • आदि संपदा – 5,000+ सांस्कृतिक दस्तावेज़

    • आदि हाट – ई-मार्केटप्लेस

  • संबद्ध एजेंसी/योजना: TRIFED, TRIs (15 राज्य)

  • पूर्व पहल: आदि वाणी – एआई आधारित जनजातीय भाषा अनुवादक

भारत ने अंतरिक्ष अन्वेषण में 9 विश्व रिकॉर्ड बनाए: इसरो

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम ने एक बार फिर वैश्विक सुर्खियाँ बटोरी हैं। इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन के अनुसार, भारत ने अब तक 9 बड़े विश्व रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं और आने वाले वर्षों में 8–10 और मील के पत्थर हासिल करने की उम्मीद है। नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत की अंतरिक्ष यात्रा—जो कम लागत वाले नवाचार और तकनीकी प्रगति पर आधारित है—आज पूरी दुनिया के लिए दक्षता और उत्कृष्टता का मॉडल बन गई है।

अंतरिक्ष अन्वेषण में भारत की ऐतिहासिक उपलब्धियाँ

 नारायणन ने पिछले दो दशकों में भारत की प्रमुख उपलब्धियों को रेखांकित किया, जिनसे इसरो वैश्विक अग्रणी बना :

  • मंगलयान (2014): भारत पहली बार में ही मंगल ग्रह पर पहुँचने वाला विश्व का पहला देश बना।

  • पीएसएलवी–C37 (2017): एक ही मिशन में 104 उपग्रह प्रक्षेपित कर विश्व रिकॉर्ड।

  • चंद्रयान–2 (2019): चंद्रमा की कक्षा में अब तक का सर्वश्रेष्ठ ऑर्बिटर कैमरा स्थापित।

  • चंद्रयान–3 (2023): चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरने वाला पहला देश बना भारत।

क्रायोजेनिक प्रौद्योगिकी में प्रगति

2014 से 2017 के बीच भारत ने क्रायोजेनिक इंजन विकास में 3 वैश्विक रिकॉर्ड बनाए, जिनमें शामिल हैं :

  • LVM3 का सबसे तेज पहला उड़ान परीक्षण (28 महीने में) — जबकि अन्य देशों में यह 37–108 महीने लगे।

  • इस उपलब्धि ने भारत को स्वदेशी क्रायोजेनिक तकनीक का अग्रणी बना दिया, जो भारी रॉकेट और गहरे अंतरिक्ष मिशनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का पैमाना

इसरो प्रमुख ने भारत के अब तक के अंतरिक्ष अभियानों के पैमाने और दायरे पर प्रकाश डाला :

  • 4,000 से अधिक रॉकेट प्रक्षेपण।

  • 133 उपग्रहों को कक्षा में स्थापित किया।

  • राष्ट्रीय सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, संचार, आर्थिक विकास और अंतरिक्ष उद्यमिता पारिस्थितिकी तंत्र में बड़ा योगदान।

  • भारत की कम लागत में अधिक करने की क्षमता ने इसके अंतरिक्ष कार्यक्रम को वैश्विक लागत–प्रभावशीलता का मानक बना दिया।

भविष्य की उपलब्धियाँ और मानव अंतरिक्ष उड़ान योजनाएँ

आने वाले वर्षों में इसरो 8–10 नए विश्व रिकॉर्ड बनाने की तैयारी में है। प्रमुख लक्ष्यों में शामिल हैं :

  • प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी में नए नवाचार।

  • पृथ्वी अवलोकन और सुरक्षा के लिए उपग्रह अनुप्रयोगों का विस्तार।

  • चंद्रमा, मंगल और उससे आगे के नए मिशन।

  • 2040 तक मानवयुक्त चंद्रमा पर उतरने का लक्ष्य, जिससे भारत अंतरिक्ष अन्वेषण करने वाले चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल होगा।

स्थिर तथ्य और मुख्य बिंदु

  • वर्तमान इसरो अध्यक्ष: वी. नारायणन

  • भारत के विश्व रिकॉर्ड: अब तक 9

  • मंगलयान (2014): पहले प्रयास में मंगल पर पहुँचने वाला पहला देश

  • पीएसएलवी–C37 (2017): एक ही मिशन में 104 उपग्रहों का प्रक्षेपण (विश्व रिकॉर्ड)

  • चंद्रयान–2 (2019): चंद्रमा पर सर्वश्रेष्ठ ऑर्बिटर कैमरा

  • चंद्रयान–3 (2023): चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरने वाला पहला देश

धर्मेंद्र प्रधान ने संयुक्त अरब अमीरात में पहला विदेशी अटल नवाचार केंद्र का शुभारंभ किया

भारत की शिक्षा जगत में ऐतिहासिक कदम उठाते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भारत का पहला विदेशी अटल इनोवेशन सेंटर (AIC) संयुक्त अरब अमीरात के आईआईटी दिल्ली–अबू धाबी परिसर में 10–11 सितंबर 2025 की अपनी दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा के दौरान उद्घाटित किया।

यह पहल अटल इनोवेशन मिशन (AIM) के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत है, जिसके माध्यम से भारत का नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र अब वैश्विक स्तर पर विस्तारित होगा। यह केंद्र अनुसंधान, उद्यमिता और ज्ञान आदान–प्रदान का हब बनेगा और भारत–यूएई के शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करेगा।

शैक्षणिक कार्यक्रम और पहल

उद्घाटन के दौरान शिक्षा मंत्री ने दो प्रमुख शैक्षणिक कार्यक्रमों की भी शुरुआत की :

  • पीएच.डी. कार्यक्रम (ऊर्जा एवं सततता – Energy & Sustainability)

  • बी.टेक कार्यक्रम (रासायनिक अभियांत्रिकी – Chemical Engineering)

मंत्री ने छात्रों और प्राध्यापकों से संवाद करते हुए उन्हें वैश्विक समस्याओं के समाधान और उद्यमिता के लिए नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र का लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया।

यूएई नेतृत्व के साथ प्रमुख चर्चाएँ

शिक्षा मंत्री ने अबू धाबी डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन एंड नॉलेज (ADEK) की अध्यक्ष सारा मुसल्लम से मुलाकात की। चर्चाओं के मुख्य बिंदु थे :

  • प्रवासी भारतीयों के लिए यूएई में भारतीय पाठ्यक्रम आधारित विद्यालयों का विस्तार।

  • भारतीय विद्यालयों में अटल इनोवेशन लैब्स की स्थापना (भारत के अटल टिंकरिंग लैब्स मॉडल पर)।

  • विद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर पर द्विपक्षीय छात्र विनिमय को बढ़ावा देना।

  • पाठ्यक्रम विकास और शिक्षक विनिमय कार्यक्रम में सहयोग।

  • भारत और यूएई के बीच शैक्षणिक योग्यताओं की परस्पर मान्यता

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के अनुरूप शिक्षा सुधारों का समन्वय।

मंत्री प्रधान ने शिक्षा को भारत–यूएई साझेदारी का महत्वपूर्ण स्तंभ बताया और ADEK की प्रतिबद्धता की सराहना की।

अटल इनोवेशन मिशन (AIM) की भूमिका

अटल इनोवेशन मिशन भारत सरकार की प्रमुख पहल है जिसका उद्देश्य नवाचार, अनुसंधान और उद्यमिता को बढ़ावा देना है। इसके तहत :

  • अटल टिंकरिंग लैब्स

  • अटल इनक्यूबेशन सेंटर

  • क्षेत्रीय नवाचार हब  स्थापित किए गए हैं।

अबू धाबी में नए केंद्र की स्थापना से AIM की पहुँच वैश्विक हो गई है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा और नवाचार सहयोग का मॉडल प्रस्तुत करेगी।

स्थिर तथ्य और मुख्य बिंदु

  • स्थान: आईआईटी दिल्ली–अबू धाबी परिसर, संयुक्त अरब अमीरात

  • उद्घाटनकर्ता: धर्मेंद्र प्रधान, केंद्रीय शिक्षा मंत्री

  • मुख्य पहल: अटल इनोवेशन मिशन (AIM) के तहत पहला विदेशी अटल इनोवेशन सेंटर

  • शैक्षणिक कार्यक्रम:

    • पीएच.डी. (ऊर्जा एवं सततता)

    • बी.टेक (रासायनिक अभियांत्रिकी)

  • सहयोगी प्राधिकरण: अबू धाबी डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन एंड नॉलेज (ADEK)

ISRO ने स्वतंत्र उत्पादन के लिए एसएसएलवी तकनीक एचएएल को हस्तांतरित की

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने 100वें प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) अब स्वतंत्र रूप से स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) का निर्माण कर सकेगा।

यह समझौता ISRO, न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL), इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर (IN-SPACe) और HAL की भागीदारी से संपन्न हुआ। यह कदम भारत के आत्मनिर्भर अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने और तेजी से बढ़ते वैश्विक स्मॉल-सैटेलाइट लॉन्च बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने की दिशा में अहम है।

समझौते की मुख्य बातें

  • अवधि: 24 माह

  • दायरा: ISRO, HAL को SSLV उत्पादन क्षमता हासिल करने के लिए प्रशिक्षण और सहयोग देगा, जिसमें शामिल हैं :

    • वाणिज्यिक प्रक्रियाएँ

    • प्रौद्योगिकी एकीकरण

    • उड़ान-तैयारी पहलू (Preparedness-to-flight aspects)

  • परिणाम: इस अवधि में ISRO के मार्गदर्शन में दो SSLV मिशनों का प्रक्षेपण किया जाएगा।

  • लक्ष्य: HAL का क्रमिक रूप से स्वतंत्र स्तर पर SSLV उत्पादन करना और निजी क्षेत्र की भागीदारी को सशक्त करना।

SSLV क्यों महत्वपूर्ण हैं?

  • उद्देश्य: 500 किलोग्राम या उससे कम वजन वाले उपग्रहों को निम्न पृथ्वी कक्षा (Low Earth Orbit) में स्थापित करना।

  • लाभ:

    • पारंपरिक प्रक्षेपण यानों की तुलना में कम लागत

    • त्वरित प्रक्षेपण की सुविधा

    • अनेक छोटे उपग्रहों को एक साथ प्रक्षेपित करने की लचीलापन

  • वैश्विक अवसर: छोटे उपग्रहों की मांग तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में SSLV भारत को वाणिज्यिक लॉन्च सेवाओं के बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दिलाएगा।

स्थिर तथ्य और प्रमुख बिंदु

  • समझौता पक्ष: ISRO, NSIL, IN-SPACe, HAL

  • उद्देश्य: SSLV उत्पादन तकनीक का हस्तांतरण

  • अवधि: 24 माह (प्रशिक्षण एवं समर्थन)

  • मील का पत्थर: ISRO का 100वाँ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौता

  • SSLV भूमिका: छोटे उपग्रहों को निम्न पृथ्वी कक्षा में स्थापित करना

  • ISRO के वैश्विक रिकॉर्ड मिशन:

    • PSLV-C37 (104 उपग्रह, 2017)

    • चंद्रयान-3 (चंद्र दक्षिण ध्रुव पर सफल लैंडिंग, 2023)

नासा के मंगल रोवर को प्राचीन जीवन के सबसे मजबूत संकेत मिले

नासा के पर्सिवियरेंस रोवर (Perseverance Rover) ने मंगल ग्रह पर एक महत्वपूर्ण खोज की है। सूखी हुई नदी नेरेट्वा वैलिस (Neretva Vallis) की चट्टानों में ऐसे खनिज और कार्बनिक तत्व मिले हैं, जो अब तक के सबसे मजबूत संकेत माने जा रहे हैं कि अरबों वर्ष पहले मंगल पर सूक्ष्म जीवों (Microbial Life) के अस्तित्व की संभावना रही हो सकती है।

क्या मिला?

  • नमूना स्थान: नेरेट्वा वैलिस, जेज़ेरो क्रेटर (प्राचीन नदी चैनल)

  • चट्टान संरचना: ब्राइट एंजेल फॉर्मेशन, मिट्टी और चिकनी शैल (Clay-rich mudstones)

  • रासायनिक संकेत:

    • कार्बनिक कार्बन (Organic Carbon)

    • आयरन फॉस्फेट (Iron Phosphate)

    • आयरन सल्फ़ाइड (Iron Sulfide)

  • दृश्य विशेषताएँ: सूक्ष्म स्तर पर “खसखस के दाने” और “तेंदुए जैसे धब्बे”, जिनमें खनिजों की उच्च सांद्रता पाई गई।

पृथ्वी पर ऐसे संकेत अक्सर झीलों और चरम वातावरण (जैसे अंटार्कटिका) में सूक्ष्म जीवों की गतिविधियों से जुड़े पाए जाते हैं।

पर्सिवियरेंस मिशन की प्रगति

  • लॉन्च: 30 जुलाई 2020

  • लैंडिंग: 18 फरवरी 2021 (जेज़ेरो क्रेटर)

  • अब तक नमूने: 30 (यह खोज 25वें नमूने से जुड़ी है)

  • बैकअप स्टोरेज: 10 टाइटेनियम ट्यूब मंगल की सतह पर सुरक्षित रखे गए हैं

  • अंतिम लक्ष्य: नमूनों को पृथ्वी पर वापस लाना

  • वर्तमान चुनौती: अनुमानित लागत अब $11 बिलियन तक पहुँच चुकी है, जिसके कारण समयसीमा 2030 के शुरुआती वर्षों से बढ़कर अब 2040 के दशक तक जा सकती है। नासा सस्ते और तेज विकल्प तलाश रहा है।

बड़े मायने : जीवन की खोज

  • फिलहाल मंगल पर जीवित जीवन के कोई प्रमाण नहीं हैं।

  • वैज्ञानिक मानते हैं कि अरबों वर्ष पहले मंगल पर तरल जल, मोटा वायुमंडल और सक्रिय भू-रसायन (Geochemistry) था, जो जीवन के अनुकूल हो सकता था।

यदि पर्सिवियरेंस की खोज जीवन के सबूत सिद्ध होती है, तो यह होगा:

  • पहली बार बाह्य-ग्रह जीवन (Extraterrestrial Life) का प्रत्यक्ष प्रमाण।

  • ग्रहों की रहने योग्य परिस्थितियों की समझ में क्रांति।

  • मंगल पर भविष्य के मानव अभियानों के लिए प्रेरणा।

यहाँ तक कि यदि जीवन सिद्ध न भी हो, तो भी यह खोज दिखाती है कि किस प्रकार अजीव प्रक्रियाएँ (Non-biological processes) जीववैज्ञानिक प्रक्रियाओं की नकल कर सकती हैं—जो खगोलजीवविज्ञान (Astrobiology) में बेहद अहम सबक है।

स्थिर तथ्य

  • रोवर: पर्सिवियरेंस (Perseverance, Mars 2020 Mission)

  • खोज: कार्बनिक कार्बन + खनिज (आयरन फॉस्फेट और आयरन सल्फ़ाइड)

  • नमूना स्थल: नेरेट्वा वैलिस, जेज़ेरो क्रेटर (प्राचीन नदी)

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