
ताइवान ने चीनी हमले की आशंका के बीच अपनी कई कंपनियों को भारत में शिफ्ट करने का फैसला किया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ताइवान की शीर्ष टेक्नोलॉजी कंपनियां, भारत में मैन्यूफैक्चरिंग करने पर विचार कर रही हैं और चीन के हमले की आशंका से दूर, भारत में ट्रांसफ करने पर विचार कर रही हैं। स्वायतता के मुद्दे पर जहां ताइवान व चीन के बीच लगातार तनाव बढ़ रहा है, वहीं बीजिंग का भारत के साथ भी विगत कुछ वर्षों से सीमा विवाद गहराया है।
भारत और ताइवान के बीच कारोबार वर्ष 2006 में दो अरब डॉलर था, जो वर्ष 2021 तक 8.9 अरब डॉलर हो चुका है। ताइवान ने घोषणा की है, कि वह मुंबई में एक नया कार्यालय खोलेगा और दिल्ली और चेन्नई के बाद यह भारत में ताइवान का तीसरा दफ्तर होगा। ताइवान के इस फैसले को एक रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इसकी ‘चीन-प्लस-वन’ रणनीति का उद्देश्य, अपने देश के व्यवसायों को जिंदा रखने के लिए चीन की जद से बाहर लगातार ऑपरेशन करने के लिए है।
भारत और ताइवान में कैसे हैं संबंध?
हालांकि, भारत के ताइवान के साथ अभी तक औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं, क्योंकि भारत अभी भी वन-चायना पॉलिसी का पालन करता है, लेकिन ताइवान ने भारत में व्यापार करने के लिए भारत में आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र स्थापित किए हैं।
ताइवान के सांस्कृतिक मंत्रालय ही भारत में ताइवान के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और जबकि दिल्ली में इसका कार्यालय एक दूतावास के रूप में कार्य करता है, चेन्नई में ताइवान का दफ्तर, एक वाणिज्य दूतावास के रूप में काम करता है।
दोनों पक्षों ने साल 1995 में एक दूसरे के देश में प्रतिनिधि कार्यालय खोले थे। नई दिल्ली में एक ताइपे आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र (TECC) और ताइपे में एक “भारत ताइपे एसोसिएशन” है। ताइवान ने दिसंबर 2012 में चेन्नई में अपना दफ्तर खोला था और अब मुंबई में भी ऑफिस खोलने जा रहा है।
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