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Indian Navy की फर्स्ट ट्रेनिंग स्क्वाड्रन दक्षिण पूर्व एशिया के लिए रवाना

भारतीय नौसेना (Indian Navy) के प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन (First Training Squadron – 1TS) ने दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक दीर्घ-परीय प्रशिक्षण तैनाती (Long-Range Training Deployment – LRTD) आरंभ की है। यह महत्वपूर्ण समुद्री अभियान 110वें एकीकृत अधिकारी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम (Integrated Officers’ Training Course – IOTC) का हिस्सा है और नौसैनिक कैडेटों को समुद्र में वास्तविक एवं व्यावहारिक परिचालन अनुभव प्रदान करने की एक प्रमुख पहल है। इस तैनाती के तहत कई नौसैनिक पोत लंबी दूरी तय करते हुए विदेशी जलक्षेत्रों में संचालित होंगे, जो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की बढ़ती नौसैनिक क्षमता और रणनीतिक सहभागिता को दर्शाता है।

यह तैनाती क्यों महत्वपूर्ण है?

दीर्घ-परीय प्रशिक्षण तैनातियाँ भावी नौसैनिक अधिकारियों के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, क्योंकि ऐसा हैंड्स-ऑन अनुभव कक्षा या बंदरगाह प्रशिक्षण से संभव नहीं होता। यह मिशन भारत की एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy) को सुदृढ़ करता है और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ सक्रिय कूटनीतिक व सुरक्षा साझेदारी को मजबूत करता है। साथ ही, यह स्वतंत्र, खुला और समावेशी इंडो-पैसिफिक के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है, जो क्षेत्रीय स्थिरता और समुद्री सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
निर्धारित बंदरगाह यात्राओं और पेशेवर संवादों के माध्यम से भारतीय नौसेना मित्र देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ करती है और क्षेत्रीय समुद्री सहयोग को बढ़ावा देती है।

पोत और संरचना

इस तैनाती में चार प्रमुख समुद्री पोत शामिल हैं—

  • आईएनएस तिर (INS Tir) – भारतीय नौसेना
  • आईएनएस शार्दुल (INS Shardul) – भारतीय नौसेना
  • आईएनएस सुजाता (INS Sujata) – भारतीय नौसेना
  • आईसीजीएस सारथी (ICGS Sarathi) – भारतीय तटरक्षक बल

नौसेना और तटरक्षक बल के पोतों का यह संयोजन भारत की एकीकृत समुद्री सुरक्षा दृष्टिकोण को दर्शाता है तथा प्रशिक्षण और परिचालन स्तर पर विभिन्न समुद्री बलों के बीच समन्वय को रेखांकित करता है।

परिचालन अनुभव और प्रशिक्षण का फोकस

इन पोतों पर सवार कैडेटों को निम्नलिखित प्रमुख समुद्री कौशलों में व्यापक प्रशिक्षण प्राप्त होता है—

  • सीमैनशिप – उन्नत नौकायन एवं समुद्री संचालन
  • नेविगेशन – खुले महासागर में सटीक नौवहन
  • पेशेवर परिचालन – वास्तविक नौसैनिक प्रक्रियाएँ
  • निर्णय-निर्माण – दबाव में नेतृत्व क्षमता
  • समुद्री प्रोटोकॉल – अंतरराष्ट्रीय मानक
  • विविध समुद्री परिस्थितियाँ – खुले समुद्र से प्रादेशिक जलक्षेत्र तक

अलग-अलग समुद्री परिस्थितियों में काम करने से ऐसा अनमोल अनुभव मिलता है जो भविष्य के नौसेना नेताओं को तैयार करता है। कैडेट्स असली दुनिया के हालात और प्रैक्टिकल ऑपरेशनल अनुभव से विशेषज्ञता हासिल करते हैं।

बंदरगाह यात्राएँ और क्षेत्रीय सहभागिता

स्क्वाड्रन दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रमुख देशों में बंदरगाह यात्राएँ करेगा—

  • सिंगापुर – प्रमुख रणनीतिक केंद्र
  • इंडोनेशिया – क्षेत्रीय समुद्री साझेदार
  • थाईलैंड – दक्षिण-पूर्व एशियाई सहभागिता बिंदु

इन यात्राओं के उद्देश्य केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें—

  • नौसैनिक कर्मियों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान
  • विदेशी बंदरगाहों में क्रू कल्याण गतिविधियाँ
  • भारत की सतत नौसैनिक उपस्थिति का प्रदर्शन
  • मित्र नौसेनाओं के साथ पेशेवर संवाद
  • द्विपक्षीय समुद्री संबंधों को सुदृढ़ करना
  • भारतीय नौसेना की पेशेवर क्षमता का प्रदर्शन शामिल है।

रणनीतिक महत्व

यह तैनाती एक्ट ईस्ट नीति को व्यवहारिक रूप में साकार करती है। इसके प्रमुख रणनीतिक पहलू हैं—

  • क्षेत्रीय सहभागिता – दक्षिण-पूर्व एशिया में सक्रिय भूमिका
  • सुरक्षा संरचना – क्षेत्रीय सुरक्षा में भारत की भूमिका सुदृढ़
  • नौवहन की स्वतंत्रता – अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्रों में अधिकारों का संरक्षण
  • नौसैनिक शक्ति प्रदर्शन – लंबी दूरी तक शक्ति प्रक्षेपण की क्षमता
  • इंडो-पैसिफिक स्थिरता – मुक्त, खुला और समावेशी क्षेत्र सुनिश्चित करना
  • प्रशिक्षण उत्कृष्टता – नौसैनिक अधिकारी विकास की गुणवत्ता का प्रमाण
  • द्विपक्षीय संबंध – दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ संबंध मजबूत करना

यह दीर्घ-परीय प्रशिक्षण तैनाती न केवल भारत की समुद्री शक्ति और प्रशिक्षण अवसंरचना की पुष्टि करती है, बल्कि यह भी सिद्ध करती है कि भारतीय नौसेना भविष्य के अधिकारियों को जटिल अंतरराष्ट्रीय समुद्री परिस्थितियों से निपटने के लिए सक्षम और पेशेवर रूप से तैयार कर रही है।

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