बाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty) अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून की नींव है, जिस पर वर्ष 1967 में हस्ताक्षर किए गए थे। इस संधि का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाह्य अंतरिक्ष शांतिपूर्ण बना रहे और समस्त मानवता के लिए सुलभ हो। जब शीत युद्ध के दौरान ‘अंतरिक्ष दौड़’ (Space Race) तेज़ हो रही थी, तब वैश्विक नेताओं ने एक ऐसे ढाँचे पर सहमति जताई थी, जो अंतरिक्ष को एक नए युद्धक्षेत्र में बदलने से रोक सके। वर्तमान में, वर्ष 2026 में भी, यह संधि सरकारी मिशनों और निजी अंतरिक्ष कंपनियों—दोनों का मार्गदर्शन करना जारी रखे हुए है।
यह संधि कई प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है, जो अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए ‘नियमों की रूपरेखा’ का काम करते हैं।
1. समस्त मानवता के लिए अंतरिक्ष
बाह्य अंतरिक्ष को समस्त मानव जाति का क्षेत्र माना गया है; इसका अर्थ यह है कि अंतरिक्ष अन्वेषण से हर देश को लाभ मिलना चाहिए, न कि केवल कुछ शक्तिशाली राष्ट्रों को।
2. खगोलीय पिंडों पर कोई स्वामित्व नहीं
कोई भी देश चंद्रमा, मंगल या किसी अन्य खगोलीय पिंड पर अपनी संप्रभुता का दावा नहीं कर सकता। सरल शब्दों में, कोई भी राष्ट्र अंतरिक्ष क्षेत्र का स्वामी नहीं हो सकता।
3. सामूहिक विनाश के हथियारों (WMDs) पर प्रतिबंध
यह संधि कक्षा में या खगोलीय पिंडों पर परमाणु हथियार या WMDs रखने पर भी सख्त प्रतिबंध लगाती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि अंतरिक्ष बड़े पैमाने पर सैन्य खतरों से मुक्त रहे।
4. अंतरिक्ष का शांतिपूर्ण उपयोग
चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंडों का उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही किया जाना चाहिए, और अंतरिक्ष में सैन्य अड्डों तथा हथियारों के परीक्षण पर प्रतिबंध होना चाहिए।
अभी, 2026 तक, इस संधि में 115 से ज़्यादा सदस्य देश शामिल हैं, जिनमें अंतरिक्ष की दुनिया की बड़ी ताकतें भी शामिल हैं, जैसे:
इसके अलावा, UAE जैसे नए अंतरिक्ष राष्ट्र और कई अफ्रीकी और दक्षिण अमेरिकी देश भी इसमें शामिल हो गए हैं; यह अंतरिक्ष की खोज के प्रति बढ़ते रुझान को दर्शाता है।
यह संधि उस व्यापक प्रणाली का भी एक हिस्सा है, जिसका प्रबंधन ‘बाह्य अंतरिक्ष मामलों के लिए संयुक्त राष्ट्र कार्यालय’ (United Nations Office for Outer Space Affairs) और ‘बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग पर समिति’ (Committee on the Peaceful Uses of Outer Space) द्वारा किया जाता है।
अन्य प्रमुख समझौतों में शामिल हैं:
भारत सभी प्रमुख संधियों का हस्ताक्षरकर्ता है, लेकिन उसने चंद्रमा समझौते का अनुसमर्थन नहीं किया है।
हालाँकि इस संधि ने एक मज़बूत नींव रखी थी, लेकिन अब कई नई चुनौतियाँ सामने आ रही हैं, जैसे:
कई विशेषज्ञों का मानना है कि 21वीं सदी की वास्तविकताओं से निपटने और सभी देशों के लिए ज़्यादा समावेशी बनने के लिए इस संधि में कुछ आधुनिक अपडेट की ज़रूरत हो सकती है।
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