विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में बनाए गए नए नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। इस याचिका में कहा गया है कि ये नियम जाति आधारित भेदभाव को सही तरह से परिभाषित नहीं करते और सभी वर्गों को समान सुरक्षा नहीं देते। यूजीसी ने अपनी गाइडलाइन में दो अहम बदलाव किए हैं, सवर्ण यानी जनरल कैटेगरी से आने छात्रों के साथ भेदभाव बताया जा रहा है।
देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को जड़ से मिटाने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को नई नियमावली लागू की है। 15 जनवरी से प्रभावी हुए इन नियमों का उद्देश्य SC, ST और OBC समुदायों के छात्रों और शिक्षकों के लिए परिसर में सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना है। नियम के अनुसार जाति-आधारित भेदभाव इससे समाप्त होगा।
हालांकि, इन नियमों ने आरक्षण जैसे एक नए विवाद को जन्म दे दिया है। सवर्ण समाज के विभिन्न संगठनों ने इसे ‘सामान्य वर्ग विरोधी’ करार देते हुए सड़कों पर प्रदर्शन शुरू कर दिया है। विवाद का मुख्य केंद्र झूठी शिकायतों के खिलाफ दंड का प्रावधान हटाना और सवर्णों को इस सुरक्षा चक्र से बाहर रखना है।
यूजीसी का कहना है कि नए नियम की जरूरत एससी, एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकना और उस पर निगरानी रखना है। नए Equity Rule के तहत सभी यूनिवर्सिटी, कॉलेज और उच्च शिक्षण संस्थानों को परिसर में 24×7 हेल्पलाइन, Equal Opportunity Centre, Equity Squads और Equity Committee का गठन करना होगा। अगर कोई भी संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है तो यूजीसी उनकी मान्यता रद्द करने या फंड रोकने जैसी सख्त कार्रवाई कर सकता है।
UGC के नए नियम अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, महिलाओं, दिव्यांगों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ किसी भी तरह के भेदभाव को रोकने पर केंद्रित हैं। इसमें भेदभाव को अनुचित व्यवहार, बहिष्कार या अवसरों से वंचित करना माना गया है। अब संस्थानों के लिए इन नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा और इसकी जिम्मेदारी सीधे संस्थान प्रमुख पर होगी।
सबसे बुनियादी आपत्ति ये है कि UGC ने “कानून” जैसा काम कर दिया. उसने इस नियमन के जरिए ऐसा ढांचा बना दिया जो नए अधिकार, नई परिभाषाएं और दंडात्मक प्रक्रिया तय करता है. आरोप लगाया जा रहा है कि ये विधायी शक्ति का अतिक्रमण है, ऐसा नियम बनाने का काम केवल संसद कर सकती है, अनुच्छेद 245–246 के तहत कानून बनाने का अधिकार संसद या विधानसभाओं को है. यूजीसी केवल केवल अधीनस्थ नियमन कर सकता है। मौलिक अधिकारों की नई व्याख्या नहीं कर सकता।
शिक्षा में आरक्षण मिलने से एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग की भागीदारी में भी काफी बढ़ोतरी देखी जा रही है। शिक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी रिपोर्ट में बताया गया था कि शैक्षणिक संस्थानों में 2014-15 से 2020-21 के बीच अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और ओबीसी के छात्रों का रजिस्ट्रेशन काफी ज्यादा हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक 2024-25 में ऐसे छात्रों के एडमिशन का आंकड़ा 3.85 करोड़ से बढ़कर 4.13 करोड़ हो गया।
UGC के नए नियम के अनुसार हर कॉलेज में 24×7 हेल्पलाइन और Equal Opportunity Centre होना जरूरी है। छात्र वहां जाकर भेदभाव की शिकायत कर सकते हैं, लेकिन नियम में झूठी या बेबुनियाद शिकायत पर कोई सजा या रोक नहीं है इसलिए बिना सबूत के भी कोई भी छात्र को फंसाकर उसका करियर बर्बाद कर सकता है।
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