सिंधु जल संधि के विषय पर पाकिस्तान ने एक बार फिर भारत को घेरने की कोशिश की है। पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार ने तेज गर्मी के बीच भारत पर पानी को हथियार बनाने का आरोप मढ़ते हुए इसे रेड लाइन करार दिया है। पानी विवाद पर पाकिस्तान से लगातार इस तरह के बयान आ रहे हैं। पाकिस्तान की ओर से भारत को इस विषय पर युद्ध की धमकी तक दी जा चुकी है।
भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम में आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला लिया था। पाकिस्तान में इससे चिंता बढ़ी है। पाकिस्तान का कहना है कि यदि भारत उसकी तरफ आने वाले नदियों के पानी को रोकता है तो उसकी बड़ी आबादी के सामने संकट खड़ा हो जाएगा। ऐसे में भारत को ऐसा करने से रुकना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के मिशन ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ पर एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि भारत की तरफ से एक साल से सिंधु जल संधि के निलंबन के कारण शांति और सुरक्षा के अतिरिक्त मानवीय मामलों में भी बेहद गंभीर प्रभाव पड़ रहे हैं।
सिंधु जल संधि के तहत भारत को ब्यास, रावी और सतलुज नदी के पानी पर जबकि पाकिस्तान को तीन पश्चिमी नदियों- सिंधु, चिनाब और झेलम के पानी पर अधिकार दिया गया था। वैसे, इन तीनों नदियों (सिंधु, चिनाब, झेलम) के भी 20 फ़ीसद पानी पर भारत का अधिकार है।
सिंधु जल संधि के पूर्व एडिशनल कमिश्नर शीराज़ मेमन का कहना है कि इस संधि के तहत दोनों देशों की कुछ बुनियादी ज़िम्मेदारियां हैं। इनमें साल में कम से कम एक बार दोनों देशों के वॉटर कमिश्नर्स की बैठक करना, नदियों में पानी के बहाव का डेटा साझा करना और दोनों ओर नदियों पर जारी प्रोजेक्ट्स पर दूसरे देशों की निरीक्षण टीमों के दौरे शामिल हैं।
उनका कहना है कि दोनों देशों के सिंधु जल कमिश्नर्स आमतौर पर मई के महीने में यह बैठक करते हैं और दोनों देशों की सरकारों को इसकी सालाना रिपोर्ट एक जून को पेश की जाती है। शीराज़ मेमन के अनुसार इस संधि पर अमल रोकने का मतलब यह है कि इससे जुड़ी बैठकें, मुआयना दौरे या नदियों में पानी के बहाव की डेटा शेयरिंग नहीं होगी।
भारत और पाकिस्तान ने सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के पानी के बंटवारे के लिए विश्व बैंक की मध्यस्थता में नौ साल की बातचीत के बाद सितंबर 1960 में सिंधु जल संधि की थी। उस समय भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्राध्यक्ष जनरल अय्यूब ख़ान ने कराची में इस समझौते पर दस्तख़त किए थे. तब यह उम्मीद जताई गई थी कि यह संधि दोनों देशों के किसानों के लिए ख़ुशहाली लाएगी और शांति, सद्भावना व दोस्ती की गारंटी होगी। नदियों के पानी के बंटवारे का यह समझौता कई युद्धों, विवादों और झगड़ों के बावजूद 65 वर्षों से बरक़रार था।
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