भारत के बाज़ार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने निवेशक शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रमों में मूल्य (प्राइस) डेटा के उपयोग और साझा करने के लिए 30 दिन की एकसमान समय-देरी (Time Lag) का प्रस्ताव रखा है। इसका उद्देश्य संवेदनशील बाज़ार डेटा के दुरुपयोग को रोकते हुए निवेशकों के लिए शैक्षणिक सामग्री को समयोचित और उपयोगी बनाए रखना है।
खबरों में क्यों?
SEBI ने निवेशक शिक्षा के लिए बाज़ार मूल्य डेटा पर 30 दिन की देरी लागू करने का मसौदा प्रस्ताव जारी किया है। यह कदम डेटा के दुरुपयोग की आशंकाओं और अत्यधिक पुराने शैक्षणिक कंटेंट की समस्या को दूर करने के लिए उठाया गया है।
नए प्रस्ताव के बारे में
- शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए शेयर मूल्य डेटा के साझा करने और उपयोग—दोनों पर एक समान 30 दिन की देरी का प्रावधान।
- इससे पहले, स्टॉक एक्सचेंज 1 दिन की देरी से डेटा साझा कर सकते थे, जबकि शिक्षकों को कम से कम 3 महीने पुराना डेटा ही उपयोग करने की अनुमति थी।
- इस असंगति से भ्रम और व्यावहारिक समस्याएँ पैदा हो रही थीं, जिन्हें यह प्रस्ताव दूर करेगा।
बदलाव की ज़रूरत क्यों पड़ी?
- हितधारकों की प्रतिक्रिया में मौजूदा व्यवस्था की दोनों सीमाओं पर समस्याएँ सामने आईं।
- एक दिन की देरी को बहुत कम माना गया और इसे दुरुपयोग के लिए संवेदनशील समझा गया, जबकि तीन महीने की देरी के कारण शैक्षणिक सामग्री पुरानी और कम प्रभावी हो जाती थी।
- SEBI का मानना है कि 30 दिन की समय-देरी एक्सचेंज डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए निवेशक शिक्षा सामग्री की प्रासंगिकता से समझौता किए बिना संतुलन बनाए रखने के लिए पर्याप्त है।
शिक्षा बनाम निवेश सलाह
- SEBI ने स्पष्ट किया है कि लाइव या लगभग रियल-टाइम मूल्य डेटा का उपयोग शिक्षा और निवेश सलाह की सीमा को धुंधला कर सकता है।
- मौजूदा कीमतों का विश्लेषण या भविष्य के मूल्य का अनुमान निवेश सलाह/रिसर्च गतिविधि के अंतर्गत आता है।
- ऐसी गतिविधियों के लिए पंजीकरण और कड़े नियामकीय मानकों का पालन आवश्यक होता है।
सुरक्षा उपाय और अनुपालन
- पहले जारी SEBI परिपत्रों के सभी सुरक्षा उपाय लागू रहेंगे।
- केवल शिक्षा से जुड़े संस्थानों को जनवरी 2025 के परिपत्र के अनुसार यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी सामग्री किसी भी तरह से सिफ़ारिश या सलाह न मानी जाए।
इस बदलाव की पृष्ठभूमि
- SEBI भारत के प्रतिभूति बाज़ार को विनियमित कर निवेशकों की सुरक्षा और निष्पक्षता सुनिश्चित करता है।
- मई 2024 में रियल-टाइम डेटा के दुरुपयोग को रोकने के लिए नियम सख़्त किए गए थे।
- जनवरी 2025 में शिक्षकों के लिए 3 महीने की देरी अनिवार्य की गई, जिसे अब यह नया प्रस्ताव तार्किक और एकरूप बनाना चाहता है।
SEBI – मुख्य तथ्य
- प्रकार: भारत के प्रतिभूति बाज़ार का वैधानिक नियामक निकाय
- उद्देश्य: निवेशक हितों की रक्षा, बाज़ार का विनियमन व विकास, पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- SEBI से पहले: भारतीय प्रतिभूति बाजार का नियमन पूंजी निर्गम नियंत्रक (Controller of Capital Issues – CCI) द्वारा पूंजी निर्गम (नियंत्रण) अधिनियम, 1947 के तहत किया जाता था।
- स्थापना: बढ़ती बाजार अनियमितताओं और निवेशकों की शिकायतों के कारण SEBI की स्थापना 1988 में की गई।
- वैधानिक शक्तियाँ: हर्षद मेहता घोटाले के बाद बाजार में उजागर हुई खामियों के चलते SEBI अधिनियम, 1992 के माध्यम से SEBI को वैधानिक शक्तियाँ प्रदान की गईं।
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