उत्तराखंड के हिमालयी वनों में वैज्ञानिकों ने मशरूम की एक पहले अज्ञात प्रजाति की खोज की है। ऊँचाई वाले क्षेत्रों में ओक (बलूत) के पेड़ों के नीचे पाई गई यह नई प्रजाति भारत की कवक (फंगल) विविधता में एक नया अध्याय जोड़ती है और देश में Hemileccinum वंश का यह पहला आधिकारिक रिकॉर्ड है।
शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड के ओक वनों में पाई गई गड्ढेदार बीजाणुओं वाली मशरूम की एक नई प्रजाति की पहचान की है, जिसे Hemileccinum indicum नाम दिया गया है। वर्ष 2022–23 के दौरान किए गए फील्ड अध्ययनों में यह खोज हुई और यह भारत में Hemileccinum वंश की पहली दर्ज उपस्थिति है।
यह मशरूम उत्तराखंड के बागेश्वर ज़िले के धाकुरी क्षेत्र में, 2,600 मीटर से अधिक ऊँचाई पर पाया गया। इसकी खोज मानसून के दौरान की जाने वाली मैक्रोफंगल सर्वेक्षण यात्राओं (macrofungal forays) के दौरान हुई, जिनका उद्देश्य बड़े कवकों का दस्तावेजीकरण करना होता है। ये सर्वेक्षण भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI), यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरिनो और सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज के शोधकर्ताओं द्वारा संयुक्त रूप से किए गए।
प्रारंभ में यह मशरूम उत्तरी अमेरिका और चीन में पाई जाने वाली समान प्रजातियों जैसा प्रतीत हुआ, लेकिन उन्नत वैज्ञानिक परीक्षणों ने इसे पूरी तरह नई प्रजाति सिद्ध किया। बहु-जीन आणविक वंशावली (multigene molecular phylogenetic) विश्लेषण के माध्यम से इसके डीएनए की तुलना विश्वभर की ज्ञात प्रजातियों से की गई। परिणामों से पता चला कि यह फ्लोरिडा की एक प्रजाति से निकट संबंध रखता है, लेकिन आनुवंशिक रूप से विशिष्ट है। इससे यह कवकों के विकासवादी वृक्ष की एक नई शाखा के रूप में स्थापित हुआ और Hemileccinum वंश के वैश्विक विस्तार को भी दर्शाता है।
Hemileccinum indicum ‘बोलेट’ समूह से संबंधित है, जिनमें गलफड़ों (gills) की जगह टोपी के नीचे छिद्र (pores) होते हैं। इसकी टोपी शुरुआत में झुर्रीदार बैंगनी-भूरी होती है, जो परिपक्व होने पर चमड़े जैसी भूरी हो जाती है। इसके छिद्रों की सतह हल्की पीली होती है और चोट लगने पर रंग नहीं बदलती। स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के नीचे इसके बीजाणुओं में सूक्ष्म गड्ढेदार संरचना दिखाई देती है, जो इसकी सबसे विशिष्ट पहचान है। इसके चिकने तने और गड्ढेदार बीजाणु इसे संबंधित प्रजातियों से अलग करते हैं।
यह मशरूम पारिस्थितिक रूप से एक्टोमाइकोराइज़ल है, अर्थात यह पेड़ों की जड़ों के साथ सहजीवी संबंध बनाता है। यह विशेष रूप से Quercus (ओक) प्रजातियों के साथ जुड़ा होता है। ऐसे कवक पेड़ों को पोषक तत्व और जल अवशोषण में मदद करते हैं, जबकि बदले में उन्हें शर्करा प्राप्त होती है। यह भूमिगत सहयोग वनों के स्वास्थ्य, मृदा स्थिरता और पोषक तत्व चक्र को मजबूत करता है। यह खोज हिमालयी वनों में कवकों की छिपी हुई लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करती है।
भारत की कवक जैव-विविधता अब भी काफी हद तक अनदेखी है, विशेषकर उच्च हिमालयी और समशीतोष्ण वनों में। Hemileccinum indicum जैसी खोजें संकेत देती हैं कि अनेक प्रजातियाँ अभी भी वैज्ञानिक दस्तावेज़ों से बाहर हैं। कवक पारिस्थितिकी संतुलन, जलवायु सहनशीलता और भविष्य के औषधीय अनुसंधान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए वनों का संरक्षण न केवल दृश्य वन्यजीवों के लिए, बल्कि उन सूक्ष्म जीवों के लिए भी आवश्यक है जो पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को सहारा देते हैं।
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