रूसी शतरंज के दिग्गज बोरिस स्पैस्की का 88 वर्ष की आयु में निधन

रूसी शतरंज ग्रैंडमास्टर बोरिस स्पैस्की, जो 10वें विश्व शतरंज चैंपियन थे, का 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ (FIDE) के महासचिव एमिल सुटोवस्की ने इस खबर की पुष्टि रॉयटर्स को दी।

बोरिस स्पैस्की शतरंज जगत की एक महान हस्ती थे, जो अपनी रणनीतिक प्रतिभा, खेल भावना और गहरी समझ के लिए प्रसिद्ध थे। एक प्रतियोगी और शतरंज के राजदूत के रूप में उनके योगदान ने इस खेल पर एक अमिट छाप छोड़ी।

बोरिस स्पैस्की का शतरंज सफर

प्रारंभिक जीवन और शीर्ष तक का सफर

बोरिस स्पैस्की का जन्म लेनिनग्राद (अब सेंट पीटर्सबर्ग), सोवियत संघ में हुआ था। उन्होंने कम उम्र में ही अपनी असाधारण शतरंज प्रतिभा प्रदर्शित की और 1955 में अंतरराष्ट्रीय ग्रैंडमास्टर बने।

उनका स्वर्णिम दौर 1969 में आया जब उन्होंने टिगरान पेट्रोसियन को हराकर 10वें विश्व शतरंज चैंपियन का खिताब जीता। स्पास्की अपने बहुमुखी खेल शैली के लिए जाने जाते थे, जिसमें वे पोजिशनल और अटैकिंग दोनों रणनीतियों में माहिर थे, जिससे वे अपने विरोधियों के लिए एक कठिन प्रतिद्वंदी बन जाते थे।

1972 का ‘शताब्दी का मुकाबला’

स्पैस्की का विश्व चैंपियन के रूप में शासन 1972 तक चला, जब उन्होंने आइसलैंड के रेकजाविक में अमेरिकी शतरंज प्रतिभा बॉबी फिशर के खिलाफ ऐतिहासिक “शताब्दी का मुकाबला” खेला। यह शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच एक प्रतिष्ठित संघर्ष बन गया, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया।

हालांकि बोरिस स्पैस्की ने शुरुआती दो गेम जीते, लेकिन अंततः वे यह मैच 12.5-8.5 के स्कोर से हार गए। बावजूद इसके, उनकी खेल भावना सराहनीय रही—विशेष रूप से छठे गेम में हारने के बाद जब उन्होंने फिशर के बेहतरीन खेल की सराहना करते हुए तालियां बजाईं, जो प्रतिस्पर्धी शतरंज में एक दुर्लभ दृश्य था। यह मुकाबला न केवल शतरंज के इतिहास में मील का पत्थर बना बल्कि शीत युद्ध के दौरान राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का प्रतीक भी बन गया।

खिताब खोने के बाद स्पास्की का जीवन

फ्रांस में नया जीवन और नई पहचान

फिशर से हारने के बाद भी स्पैस्की शतरंज के शीर्ष खिलाड़ियों में बने रहे और विश्व चैंपियनशिप चक्र में भाग लेते रहे। 1978 में, उन्होंने फ्रांस में बसने का निर्णय लिया और वहां की नागरिकता प्राप्त कर ली।

उन्होंने फ्रांस का प्रतिनिधित्व 1984, 1986 और 1988 के शतरंज ओलंपियाड में किया। 1990 के दशक में, वे अक्सर पेरिस के जार्डिन डू लक्ज़मबर्ग पार्क में अनौपचारिक शतरंज खेलते हुए देखे जाते थे। सोवियत शतरंज प्रणाली से अलग होने के बावजूद, वे दुनिया भर में अपने खेल कौशल और योगदान के लिए सम्मानित किए जाते रहे।

अंतिम वर्ष और स्वास्थ्य समस्याएँ

2000 के दशक में उम्र बढ़ने के साथ स्पैस्की का स्वास्थ्य खराब होने लगा। 2012 में, उनके अचानक पेरिस से लापता होने की खबर ने शतरंज जगत को चिंता में डाल दिया। हफ्तों की अनिश्चितता के बाद, वे अक्टूबर 2012 में मास्को में दिखाई दिए, जो उनके जीवन के अंतिम वर्षों का एक रहस्यमयी अध्याय बन गया।

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vikash

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