भारतीय जैव-विविधता अध्ययन में हाल ही में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज हुई है। ओडोनैटोलॉजिस्ट्स (व्याधपतंग/ड्रैगनफ़्लाई विशेषज्ञों) ने पश्चिमी घाट (Western Ghats) के दक्षिणी हिस्से में क्रोकोथेमिस एरिथ्रैया (Crocothemis erythraea) नामक दुर्लभ ड्रैगनफ़्लाई प्रजाति की उपस्थिति की फिर से पुष्टि की है। पहले इसे आम प्रजातियों से समानता के कारण गलत पहचाना गया था। यह पुनः खोज न केवल उच्च ऊँचाई वाले आवासों की पारिस्थितिक विशिष्टता को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि प्राचीन जलवायु घटनाओं ने आज की जैव-विविधता को कैसे आकार दिया।
सामान्यतः यूरोप, मध्य एशिया और हिमालय जैसे क्षेत्रों में पाई जाती है।
हाल ही में इसकी पुष्टि केरल और तमिलनाडु की ऊँची पर्वतीय श्रेणियों (550 मीटर से अधिक ऊँचाई) में हुई है।
यह प्रजाति विशेष रूप से शोला वनों और घासभूमि (Montane Grasslands) में जीवित पाई गई।
इसका स्वरूप सामान्य क्रोकोथेमिस सर्विलिया (Crocothemis servilia) से मिलता-जुलता है, जिसके कारण पहले इसे गलत पहचाना गया था।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रजाति हिम युग (Ice Age) के दौरान दक्षिण भारत में पहुँची, जब वैश्विक तापमान कम था और शीतोष्ण प्रजातियाँ अधिक दक्षिण की ओर प्रवास कर सकती थीं।
तापमान बढ़ने के बाद इसने उच्च पर्वतीय शोला वन और घासभूमियों में शरण ली और हज़ारों वर्षों के जलवायु परिवर्तनों के बीच जीवित रही।
यह पुनः खोज दर्शाती है कि प्राचीन जलवायु परिवर्तनों ने आज की प्रजातियों की संरचना को कैसे प्रभावित किया।
इसका जीवित रहना संकेत देता है कि ऐसे कई और प्राचीन/अवशेष प्रजातियाँ (Relic Species) उच्च पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्रों में छिपी हो सकती हैं, जिनका अभी दस्तावेजीकरण होना बाकी है।
युनेस्को विश्व धरोहर स्थल और विश्व के आठ “जैव-विविधता हॉटस्पॉट्स” में शामिल।
इस तरह की खोजें इसकी वैश्विक पारिस्थितिक अहमियत को और मजबूत करती हैं।
यह खोज शोला वनों और पर्वतीय घासभूमियों की नाज़ुकता पर ध्यान दिलाती है।
इन पर लगातार खतरे मंडरा रहे हैं:
पर्यटन का दबाव
बागान (Plantation) विस्तार
जलवायु परिवर्तन
इन आवासों की रक्षा केवल ड्रैगनफ़्लाई ही नहीं, बल्कि कई अन्य स्थानिक (Endemic) और दुर्लभ प्रजातियों के लिए भी ज़रूरी है।
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