वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को लेकर देशभर में चर्चा तेज हो गई है, जब 5 अप्रैल 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे अपनी मंजूरी प्रदान की। यह अधिनियम वक्फ संपत्तियों के प्रशासनिक ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव को चिह्नित करता है। यह विधेयक लोकसभा और राज्यसभा में तीन दिन की गहन बहस के बाद पारित हुआ। सरकार का दावा है कि यह अधिनियम पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है, जबकि विरोधियों का कहना है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
मुख्य बिंदु:
राष्ट्रपति की मंजूरी: 5 अप्रैल 2025 को कानून मंत्रालय द्वारा इसकी सूचना जारी की गई।
संसदीय बहस: लोकसभा और राज्यसभा में तीन दिन की बहस के बाद विधेयक पारित हुआ।
कानूनी चुनौती: AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, यह दावा करते हुए कि यह धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है।
सरकार का पक्ष: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि यह अधिनियम इस्लामी धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं करता। वक्फ दान केवल मुस्लिम वकिफ (दानदाता) द्वारा ही किया जा सकता है।
गैर-मुस्लिमों की भागीदारी: केवल प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए वक्फ बोर्डों/परिषदों में गैर-मुस्लिमों की भागीदारी की अनुमति दी गई है, जिससे पारदर्शिता बढ़ाई जा सके और दान का सही उपयोग हो।
भ्रम दूर करने का प्रयास: शाह ने कहा कि वक्फ प्रणाली धार्मिक बनी रहेगी, लेकिन बोर्ड और परिषदें केवल प्रशासनिक निकाय हैं। उन्होंने विपक्ष पर “वोट बैंक की राजनीति” के तहत भ्रम फैलाने का आरोप लगाया।
मदरसे और मुस्लिम शिक्षा पर प्रभाव: कुछ आलोचकों ने चिंता जताई है कि वक्फ द्वारा समर्थित शैक्षणिक संस्थानों पर गैर-मुस्लिम प्रशासनिक निगरानी से असर पड़ सकता है। सरकार का कहना है कि शैक्षणिक और धार्मिक गतिविधियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
यह अधिनियम भविष्य में संवैधानिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है और इसका प्रभाव देश की वक्फ संपत्तियों के प्रशासन पर दूरगामी हो सकता है।
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