प्रसिद्ध कन्नड़ लोक गायिका पद्मश्री सुकरी बोम्मागौड़ा का निधन

प्रसिद्ध लोकगायिका और पद्मश्री सम्मानित सुकरी बोम्मागौड़ा, जिन्हें स्नेहपूर्वक “सुक्राज्जी” कहा जाता था, का 13 फरवरी 2025 को 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे कर्नाटक के मणिपाल स्थित अस्पताल में इलाज करा रही थीं। सुक्रि बोम्मगौड़ा कर्नाटक के हलक्की वोक्कलिगा समुदाय की एक सम्मानित हस्ती थीं, जिन्होंने लोक परंपराओं को अपने संगीत के माध्यम से संरक्षित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

हलक्की लोकसंगीत को संवारने में सुकरी बोम्मागौड़ा की भूमिका

सुक्राज्जी को हलक्की लोक परंपराओं का “चलता-फिरता विश्वकोश” माना जाता था। उन्होंने लगभग 5,000 लोकगीतों को याद कर लिया था, जिनमें विवाह, जन्म और त्योहारों जैसे महत्वपूर्ण जीवन प्रसंग शामिल थे। 1980 के दशक में, आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) ने उनके सैकड़ों गीत रिकॉर्ड किए, जिससे उनकी ज्ञान परंपरा भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित हो सकी। उनके गीत मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते रहे, जिससे हलक्की वोक्कलिगा समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को मजबूती मिली।

सामाजिक मुद्दों पर सुकरी बोम्मागौड़ा का प्रभाव

1937 में उत्तर कन्नड़ जिले के बादिगेरी गांव में जन्मीं सुक्राज्जी का विवाह 16 वर्ष की उम्र में बोम्मगौड़ा से हुआ था। उनके पति की मृत्यु शराब की लत के कारण हुई, जिसने उन्हें अंकोला और आसपास के क्षेत्रों में शराब विरोधी अभियान का नेतृत्व करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपने गीतों, भाषणों और कहानियों के माध्यम से शराब की बुराइयों और उसके पारिवारिक प्रभावों को लेकर जागरूकता फैलाई। उनका प्रभाव केवल संगीत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर भी जागरूकता बढ़ाने के लिए अथक प्रयास किए।

प्रमुख पुरस्कार और सम्मान

सुक्राज्जी की लोकसंगीत और संस्कृति को संरक्षित करने में उनकी भूमिका के लिए उन्हें 2017 में प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा, उन्हें कर्नाटक सरकार द्वारा राज्योत्सव पुरस्कार और नाडोजा पुरस्कार भी प्राप्त हुए। उनके योगदान को शिक्षा क्षेत्र में भी मान्यता मिली, और अब उनकी जीवनी और कार्यों को कर्नाटक के मध्य विद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है, जिससे छात्र लोक परंपराओं को जान सकें और उनसे प्रेरणा ले सकें।

सुक्राज्जी की स्थायी विरासत

उनका घर एक सांस्कृतिक केंद्र बन गया था, जहां हर सप्ताह सैकड़ों स्कूली बच्चे उनसे मिलने आते थे। वे उन्हें कहानियां सुनातीं और जीवन के महत्वपूर्ण सबक सिखातीं, खासकर एक सादा और प्रकृति से जुड़ा जीवन जीने की महत्ता पर बल देती थीं। उनके निधन पर उत्तर कन्नड़ के नेताओं और गणमान्य व्यक्तियों ने शोक व्यक्त किया और लोकसंगीत एवं सामाजिक सुधार में उनके अतुलनीय योगदान को याद किया।

सुकरी बोम्मागौड़ा का सफर एक लोकगायिका, समाज सुधारक और सांस्कृतिक संरक्षक के रूप में कर्नाटक की धरोहर में अमिट छाप छोड़ गया है। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी और हलक्की लोकसंगीत को जीवंत बनाए रखेगी।

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vikash

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