नोबेल शांति पुरस्कार का घोषणा कर दिया गया। यह पुरस्कार इस साल विश्व के सबसे अशांत क्षेत्र के नाम रहा, जिसके विजेता जेल में बंद बेलारूस के मानवाधिकार कार्यकर्ता एलेस बियालियात्स्की, रूसी मानवाधिकार संगठन ‘मेमोरियल’ और यूक्रेनी संगठन ‘सेंटर फॉर सिविल लिबर्टीज’ बने हैं। इससे पहले साहित्य के क्षेत्र में फ्रांस की लेखिका को नोबेल से सम्मानित किया गया था। पहली बार 1901 में इस पुरस्कार की शुरुआत की गई थी।
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तीनों नामों की घोषणा करते हुए नॉर्वेजियन नोबेल समिति की अध्यक्ष बेरिट रीज-एंडरसन ने कहा, इस बार का शांति पुरस्कार मानवाधिकार, लोकतंत्र और पड़ोसी देशों बेलारूस, रूस व यूक्रेन में शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पैरोकारों को सम्मानित करने के लिए दिया गया है।
नोबेल शांति पुरस्कार ऐसे व्यक्ति या संस्था को दिया जाता है, जिन्होंने विश्व में शांति स्थापित करने या शांति को बढ़ावा देने के लिए बेहतरीन काम किया है। इन्हीं में एक बियालियात्स्की हैं, जो बेलारूस में साल 1980 के मध्य से ही लोकतांत्रिक आंदोलन के प्रमुख नेतृत्वकर्ता रहे हैं। तमाम दबावों के बावजूद वह अधिनायकवादी देश में मानवाधिकार, नागरिक अधिकारों के लिए खुलकर काम करते आए हैं।
नोबेल पुरस्कार दूसरा विजेता संगठन मेमोरियल सोवियत संघ के दौर में 1987 में बना था, जिसका कार्य साम्यवादी दमन के पीड़ितों की यादें सुनिश्चित रखना था। संघ के विघटन के बाद भी इसने रूस में मानवाधिकार के दमन की जानकारी जुटाना जारी रखा और राजनीतिक बंदियों के हाल पर भी नजर रखी।
सेंटर फॉर सिविल लिबर्टीज की स्थापना यूक्रेन में 2007 के दौरान जारी उथल-पुथल के बीच मानवाधिकार और लोकतंत्र के लिए हुई थी। तब से संगठन यूक्रेनी नागरिक समाज को मजबूत करने और सरकार पर देश को पूर्ण लोकंतत्र बनाने के लिए दबाव बनाता रहा है। फरवरी में रूसी आक्रमण के बाद से यह यूक्रेनी नागरिकों पर रूसी सेना के अपराधों को दस्तावेजों में दर्ज कर रहा है।
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