भारतीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने केरल के वेस्टर्न घाट (पश्चिमी घाट) में तितली की एक नई प्रजाति की खोज की है, जिसका नाम Zographetus mathewi रखा गया है। यह तितली निचली ऊँचाई वाले वनों में पाई गई है और केवल इस क्षेत्र में ही पाई जाती है, जो भारत की समृद्ध वन्यजीव विविधता में एक और दुर्लभ योगदान है। यह खोज वेस्टर्न घाट जैसी वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट की रक्षा और अध्ययन के महत्व को उजागर करती है।
खोज और वैज्ञानिक अध्ययन
इस तितली की खोज त्रावणकोर नेचर हिस्ट्री सोसाइटी, इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल रिसर्च, इकोलॉजी एंड कंजर्वेशन और जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों ने की। शुरुआत में वैज्ञानिकों ने इसे Zographetus ogygia नामक पहले से ज्ञात प्रजाति समझा, लेकिन इसके पंखों के पैटर्न और जननांग संरचनाओं का सूक्ष्म अध्ययन करने के बाद इसे एक नई प्रजाति के रूप में पुष्टि की गई। यह विस्तृत शोध Entomon नामक वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
नामकरण और विशेषताएँ
Zographetus mathewi इस वंश (genus) की 15वीं और भारत में पाई गई पाँचवीं प्रजाति है। यह Zographetus satwa समूह से संबंधित है, जो अपने विशेष पंखों और नर तितलियों की खास शारीरिक रचनाओं के लिए जाना जाता है। इस तितली का नाम प्रतिष्ठित भारतीय कीटविज्ञानी जॉर्ज मैथ्यू के सम्मान में रखा गया है। इसका सामान्य नाम सह्याद्रि स्पॉटेड फ्लिटर रखा गया है, जिसमें “सह्याद्रि” वेस्टर्न घाट का स्थानीय नाम है।
रूप-रंग और आवास
इस तितली की प्रमुख पहचान इसके पीले-ओकर रंग के पिछले पंख, बालयुक्त अगले पंख, और नरों में सूजे हुए पंखों की नसें हैं, जो इसे अन्य समान प्रजातियों से अलग बनाते हैं। यह केरल के 600 मीटर से कम ऊँचाई वाले वनों में पाई जाती है। इसके लार्वा Aganope thyrsiflora नामक एक लेग्यूम बेल पर निर्भर करते हैं। वयस्क तितलियाँ दुर्लभ हैं, लेकिन वैज्ञानिकों ने कल्लार, शेंदुरुनि, एदमलयार और नीलांबुर जैसे क्षेत्रों में इसके कई लार्वा और प्यूपा पाए हैं, जिससे संकेत मिलता है कि यह प्रजाति पहले सोचे जाने से अधिक व्यापक हो सकती है।
खोज का महत्व
Zographetus mathewi की खोज वेस्टर्न घाट में छिपी जैव विविधता को उजागर करती है और यह दर्शाती है कि निचली ऊँचाई वाले वनों की रक्षा कितनी आवश्यक है। यह खोज यह भी दर्शाती है कि विस्तृत फील्ड अनुसंधान और वैज्ञानिक अवलोकन नई प्रजातियों की पहचान में कितना महत्वपूर्ण होता है। ऐसी जानकारियाँ संरक्षण प्रयासों को प्रोत्साहित कर सकती हैं और दुर्लभ वन्यजीवों की सुरक्षा के प्रति जन-जागरूकता बढ़ा सकती हैं।
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