सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने हाल ही में सांसद के रूप में शपथ लेकर नया इतिहास रच दिया है। वह भारत की पहली LGBTQ राज्यसभा सदस्य बन गईं हैं। यह कदम भारत में LGBTQ+ समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिहाज से बहुत ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मेनका गुरुस्वामी ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, हार्वर्ड लॉ स्कूल और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री हासिल की है। मेनका गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट हैं और कई संवैधानिक मामलों में अपनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने 1997 में भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल अशोक देसाई के साथ काम करते हुए कानून की बारीकियां सीखीं। मेनका उन्हें अपना मेंटर मानती हैं।
किरण मनराल की किताब राइजिंग: 30 वीमेन हू चेंज्ड इंडिया में भी मेनका गुरुस्वामी को शामिल किया गया है। साल 2017 से 2019 तक वह न्यूयॉर्क के कोलंबिया लॉ स्कूल में बीआर आंबेडकर रिसर्च स्कॉलर और लेक्चरर थीं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सामने कई महत्वपूर्ण मामलों में अपनी दलीलें रखी हैं।
उनकी स्कूली पढ़ाई हैदराबाद पब्लिक स्कूल में हुई, जिसके बाद उन्होंने दिल्ली के सरदार पटेल स्कूल से हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने इसके बाद नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु से साल 1997 में BALLB की डिग्री ली। उन्होंने इसके बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से BCL और फिर हार्वर्ड लॉ स्कूल से LLM किया। मेनका गुरुस्वामी LLB करने के बाद 1997 में बार काउंसिल से जुड़ीं और तब के अटॉर्नी जनरल अशोक देसाई के साथ काम शुरू किया। उन्होंने ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड से डिग्री लेने के बाद न्यूयॉर्क में वकालत की।
मेनका गुरुस्वामी उन वकीलों में शामिल रही हैं, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में उस ऐतिहासिक केस में बहस की थी, जिसके बाद 2018 में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को आंशिक रूप से रद्द कर दिया गया। इस फैसले के बाद भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था।
मेनका गुरुस्वामी की पार्टनर अरुंधति काटजू हैं। वह पेशे से वकील हैं। इंडियन पीनल कोड (IPC) की धारा 377 के खिलाफ कानूनी लड़ाई में मेनका गुरुस्वामी और उनकी पार्टनर अरुंधति काटजू दोनों महत्वपूर्ण भूमिका में थीं। दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2009 में धारा 377 को खत्म कर दिया था, लेकिन इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट में मेनका और अरुंधति ने मिलकर इस मामले की पैरवी की। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए धारा 377 को फिर से लागू कर दिया।
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