भारत के सबसे बहादुर सैनिकों में से एक, कर्नल सोनम वांगचुक (सेवानिवृत्त) का 10 अप्रैल को लेह में 61 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्हें “लद्दाख का शेर” के नाम से जाना जाता था; वे एक सम्मानित युद्ध नायक थे और उन्हें प्रतिष्ठित ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया था, जो भारत का दूसरा सबसे बड़ा युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है। उनके निधन के साथ ही एक ऐसे युग का अंत हो गया, जिसकी पहचान साहस, नेतृत्व और राष्ट्र सेवा से होती थी।
कर्नल वांगचुक ने वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान लद्दाख स्काउट्स में मेजर के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने 18,000 फीट की ऊंचाई पर बतालिक सेक्टर के चोरबत ला क्षेत्र में एक साहसिक अभियान का नेतृत्व करते हुए दुश्मन से एक महत्वपूर्ण चोटी को दोबारा हासिल किया। यह ऑपरेशन विजय की शुरुआती और निर्णायक सफलताओं में गिना जाता है।
उनकी बहादुरी और नेतृत्व के लिए उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। कर्नल वांगचुक को भारतीय सेना के एक प्रेरणादायक और समर्पित अधिकारी के रूप में जाना जाता था।
कर्नल वांगचुक का जन्म 11 मई, 1964 को लद्दाख के लेह जिले के शंकर गांव में हुआ था। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के 30 से ज़्यादा साल मिलिट्री सर्विस को दिए और 2018 में रिटायर हुए। कर्नल वांगचुक ने कारगिल युद्ध के दौरान चोरबाट ला दर्रे पर कब्जा कर भारत को महत्वपूर्ण रणनीतिक जीत दिलाई थी। उन्होंने लद्दाख स्काउट्स के जवानों का नेतृत्व किया और बेहद दुर्लभ और खतरनाक मौसम और परिस्थितियों में पाकिस्तानी सैनिकों को पीछे धकेल दिया और ऊंचाई पर स्थित दुश्मन की चौकियों पर कब्जा किया।
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