भारतीय मूल के वैज्ञानिक वीरभद्रन रामनाथन को क्रैफोर्ड पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, जिसे व्यापक रूप से “भू-विज्ञान का नोबेल” कहा जाता है। जलवायु परिवर्तन पर उनके दशकों लंबे शोध ने यह समझ ही बदल दी कि पृथ्वी का तापमान कैसे बढ़ता है। औद्योगिक गैसों के तापीय प्रभाव की खोज से लेकर वैश्विक पर्यावरण नीतियों को आकार देने तक, उनके कार्य ने विज्ञान और समाज—दोनों पर गहरा प्रभाव डाला है। यह पुरस्कार साक्ष्य-आधारित जलवायु विज्ञान के जरिए पृथ्वी की रक्षा के लिए समर्पित एक जीवनकाल के योगदान को मान्यता देता है।
वीरभद्रन रामनाथन कौन हैं?
- वीरभद्रन रामनाथन भारतीय मूल के वायुमंडलीय वैज्ञानिक हैं, जिनके कार्यों ने जलवायु विज्ञान को नई दिशा दी।
- दक्षिण भारत में जन्मे और शिक्षित रामनाथन ने बेंगलुरु में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए।
- पाँच दशकों से अधिक के करियर में उन्होंने विश्व के अग्रणी संस्थानों में काम करते हुए वैश्विक तापन (ग्लोबल वार्मिंग) पर वैज्ञानिक सोच को मूल रूप से बदला।
- उनके शोध से सिद्ध हुआ कि जलवायु परिवर्तन केवल कार्बन डाइऑक्साइड से नहीं, बल्कि कई ऊष्मा-फँसाने वाली गैसों के संयुक्त प्रभाव से संचालित होता है।
वह खोज जिसने जलवायु विज्ञान को बदल दिया
- 1970 के दशक में नासा के लैंगली रिसर्च सेंटर में कार्य करते हुए रामनाथन ने यह खोज की कि क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) अत्यधिक मात्रा में ऊष्मा को फँसाते हैं।
- 1975 में ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित उनके शोधपत्र ने दिखाया कि एक अकेला CFC अणु, कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में हजारों गुना अधिक तापन पैदा कर सकता है।
- यह पहली स्पष्ट वैज्ञानिक पुष्टि थी कि CO₂ के अलावा अन्य गैसें भी वैश्विक तापन को तेज़ी से बढ़ा सकती हैं—जिससे जलवायु अनुसंधान की दिशा ही बदल गई।
ट्रेस गैसें और तेज़ होती वैश्विक गर्मी
- रामनाथन के बाद के शोध ने मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ट्रेस गैसों की शक्तिशाली भूमिका उजागर की।
- 1985 में सह-लेखित शोध में उन्होंने चेतावनी दी कि ये गैसें अपेक्षा से कहीं तेज़ गति से वैश्विक तापन बढ़ा सकती हैं।
- इसी वैज्ञानिक प्रमाण ने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके तहत CFCs को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया गया।
- यह संधि सबसे सफल पर्यावरणीय समझौतों में गिनी जाती है और इसने अतिरिक्त वैश्विक तापन को काफी हद तक रोकने में मदद की।
विज्ञान, नैतिकता और वैश्विक नेतृत्व
- रामनाथन ने नीति-निर्माताओं और वैश्विक नेताओं को सलाह दी है। वे पोंटिफिकल अकादमी ऑफ साइंसेज़ के सदस्य रहे हैं, जहाँ उन्होंने तीन पोपों को जलवायु नैतिकता पर परामर्श दिया।
- वे लगातार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर गरीब और वंचित समुदायों पर पड़ता है।
- व्यक्तिगत जीवन में वे स्वयं टिकाऊ जीवनशैली अपनाते हैं, लेकिन यह भी स्पष्ट करते हैं कि जलवायु संकट का समाधान केवल व्यक्तिगत प्रयासों से नहीं, बल्कि नीतिगत निर्णयों और नेतृत्व से ही संभव है।
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