भारत रत्न भूपेन हजारिका जन्म शताब्दी समारोह

भारत ने भारत रत्न से सम्मानित दिग्गज गायक, कवि और संगीतकार भूपेन हजारिका की 100वीं जयंती का उत्सव मनाना शुरू कर दिया है। अपनी सशक्त आवाज़ और इंसानियत, समानता तथा सांस्कृतिक एकता पर आधारित अमर गीतों के लिए जाने जाने वाले हजारिका का काम आज भी पीढ़ियों को प्रेरित करता है। यह शताब्दी समारोह उनके संगीत, सिनेमा और सामाजिक परिवर्तन में अमूल्य योगदान को सम्मानित करने और उनकी विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का प्रयास है।

भूपेन हजारिका कौन थे?

भूपेन हजारिका का जन्म 8 सितंबर 1926 को असम में हुआ था। वे अपनी आत्मीय गायकी, प्रभावशाली गीतों और समाज को जागरूक करने वाली रचनाओं के कारण भारत के सबसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं। उन्होंने आम जनता के जीवन, वंचितों के संघर्ष और असम तथा पूर्वोत्तर की सुंदरता को अपने गीतों में स्वर दिया।

उन्हें संगीत और संस्कृति में असाधारण योगदान के लिए भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उनका निधन 5 नवंबर 2011 को 85 वर्ष की आयु में हुआ।

प्रारंभिक जीवन

भूपेन हजारिका का जन्म 8 सितंबर 1926 को असम के सदिया नगर में हुआ। वे अपनी माँ से पारंपरिक असमिया गीत सुनते हुए बड़े हुए। 10 साल की उम्र में ही उन्हें सांस्कृतिक दिग्गज ज्योतिप्रसाद अग्रवाला और विष्णु प्रसाद राभा ने खोज लिया था। 12 साल की उम्र में उन्होंने पहला गीत रिकॉर्ड किया और जल्दी ही अपनी गहरी आवाज़ और काव्यात्मक प्रतिभा के लिए प्रसिद्ध हो गए।

शिक्षा और प्रेरणा

उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाई की और बाद में अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि हासिल की। वहीं उनकी मुलाकात नागरिक अधिकारों के योद्धा और गायक पॉल रोब्सन से हुई, जिन्होंने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। रोब्सन से प्रेरणा लेकर हजारिका ने संगीत को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया और इंसानियत, न्याय तथा समानता पर आधारित गीत लिखे।

भूपेन हजारिका की संगीत धरोहर

भूपेन हजारिका ने मुख्य रूप से असमिया भाषा में गीत लिखे और गाए, लेकिन उनके गीतों का अनुवाद बंगाली, हिंदी और अन्य भाषाओं में भी हुआ। उनके कुछ लोकप्रिय गीत हैं:

  • बिस्तीर्णो पारोरे

  • मोई एति जाजाबोर

  • मनुहे मनुहोर बाबे

उन्होंने असम और पूर्वोत्तर भारत की लोक परंपराओं को भारतीय सिनेमा में स्थान दिलाया और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया। उनके गीत सांप्रदायिक सौहार्द और विश्व बंधुत्व के संदेश भी देते थे।

सिनेमा और राजनीति में योगदान

गायक होने के साथ-साथ हजारिका फिल्म निर्देशक और गीतकार भी थे। उन्होंने पुरस्कार विजेता असमिया फिल्में बनाईं और हिंदी तथा बंगाली फिल्मों जैसे रुदाली और दमन में संगीत दिया। वे असम विधान सभा के सदस्य रहे और 1998 से 2003 तक संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष भी रहे।

सम्मान और पुरस्कार

भूपेन हजारिका को जीवनकाल और निधन के बाद भी अनेक पुरस्कार मिले:

  • राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (1975)

  • पद्मश्री (1977) और पद्मभूषण (2001)

  • दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (1992)

  • संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप (2008)

  • पद्मविभूषण (2012, मरणोपरांत)

  • भारत रत्न (2019, मरणोपरांत)

उनकी स्मृति में मूर्तियाँ, डाक टिकट और असम का ढोला-सदिया पुल (भूपेन हजारिका सेतु) समर्पित किया गया है।

अंतिम समय और निधन

जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने फिल्मकार कल्पना लाजमी के साथ कई हिंदी फिल्मों पर काम किया। 5 नवंबर 2011 को मुंबई में उनका निधन हो गया। असम में उनके अंतिम संस्कार में लाखों लोग शामिल हुए, जो उनके प्रति जनता के अपार प्रेम और सम्मान का प्रमाण था।

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vikash

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