भारत ने बांग्लादेश से भूमि मार्ग से कुछ जूट उत्पादों और बुने हुए कपड़ों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। हालांकि, विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने एक अधिसूचना में कहा कि इसकी अनुमति केवल न्हावा शेवा बंदरगाह के माध्यम से दी गई है। 17 मई को भारत ने बांग्लादेश से रेडीमेड कपड़ों और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों जैसी कुछ वस्तुओं के आयात पर बंदरगाह प्रतिबंध लगा दिया था। इन प्रतिबंधों के अंतर्गत आने वाले उत्पादों में जूट उत्पाद, एकल सन यार्न, जूट का एकल यार्न, बुने हुए कपड़े या फ्लेक्स तथा जूट के बिना साफ किए बुने हुए कपड़े शामिल हैं।
भारत सरकार ने बांग्लादेश से आने वाले जूट और उससे संबंधित उत्पादों पर नई बंदरगाह प्रतिबंध नीति लागू की है। यह निर्णय 27 जून 2025 से प्रभावी हो गया है। इसके तहत सभी थल और समुद्री बंदरगाहों पर इन उत्पादों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है, मुंबई स्थित न्हावा शेवा बंदरगाह को छोड़कर। यह निर्णय विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) की अधिसूचना के माध्यम से जारी किया गया। इस कदम का उद्देश्य भारतीय जूट उद्योग को सस्ती और सब्सिडी युक्त आयातित जूट से हो रहे नुकसान से बचाना है।
प्रभावी तिथि: 27 जून 2025 से लागू
जिन उत्पादों पर प्रतिबंध लागू है:
फ्लैक्स टोह और वेस्ट (धागा वेस्ट सहित)
जूट व अन्य बास्ट फाइबर
सिंगल यार्न ऑफ जूट
बुने हुए / बिना ब्लीच किए गए जूट के कपड़े
प्रतिबंधित प्रवेश बिंदु:
भारत-बांग्लादेश के सभी ज़मीनी बॉर्डर पोर्ट्स
सभी समुद्री बंदरगाह, न्हावा शेवा (मुंबई) को छोड़कर
प्रभावित राज्य:
पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, मेघालय
प्रभावित क्षेत्र:
संगठित जूट मिलें
मूल्य संवर्धित जूट उत्पाद इकाइयाँ
किसान और ग्रामीण श्रमिक वर्ग
भारत ने पहले भी एंटी-डंपिंग शुल्क लगाया था, फिर भी बांग्लादेश से जूट आयात बढ़ता रहा।
बांग्लादेश द्वारा निर्यात पर दी जा रही सब्सिडी, भारत के अनुसार, निष्पक्ष बाज़ार पहुंच नियमों का उल्लंघन है।
सस्ती जूट आयात से हुआ नुकसान:
भारतीय मिलों की उत्पादन क्षमता कम उपयोग हो रही है
ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी बढ़ रही है
किसानों की आय में गिरावट आई है
[wp-faq-schema title="FAQs" accordion=1]“भारत द्वारा सद्भावना में दी गई बाज़ार पहुंच की अनुमति का दुरुपयोग भारत के आर्थिक हितों को नुकसान नहीं पहुँचा सकती। बांग्लादेश को ऐसी अनुचित व्यापारिक प्रथाओं की अनुमति नहीं दी जा सकती जो हमारे किसानों और श्रमिकों की आजीविका को खतरे में डालें।” — सरकारी स्रोत
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