COP33 Summit 2028: भारत ने अचानक क्यों वापस लिया मेज़बानी का फैसला? जानिए पूरी खबर

वैश्विक जलवायु मंच पर एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। भारत ने 2028 में होने वाले COP33 Climate Summit की मेज़बानी करने की अपनी योजना वापस ले ली है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया जलवायु संकट से निपटने के लिए एकजुट हो रही है।

क्या है पूरा मामला?

भारत ने पहले 2028 में होने वाले 33वें Conference of Parties (COP33) की मेज़बानी में रुचि दिखाई थी, लेकिन अब सरकार ने इस प्रस्ताव से पीछे हटने का निर्णय लिया है।

इस संबंध में भारत ने आधिकारिक रूप से United Nations Framework Convention on Climate Change (UNFCCC) को पत्र भेजकर अपने फैसले की जानकारी दी।

क्यों बदला भारत का फैसला?

सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत ने अपने 2028 के दीर्घकालिक योजनाओं और संसाधनों की समीक्षा की।

  1. समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकला कि इतने बड़े वैश्विक आयोजन की मेज़बानी करना फिलहाल प्राथमिकता में नहीं है।
  2. इसलिए भारत ने रणनीतिक रूप से इस जिम्मेदारी से पीछे हटना बेहतर समझा।

पहले से चल रही थी तैयारी

दिलचस्प बात यह है कि भारत ने इस समिट के लिए तैयारी भी शुरू कर दी थी—

  1. जुलाई 2025 में पर्यावरण मंत्रालय ने एक विशेष टीम बनाई थी
  2. आयोजन के लिए शुरुआती प्लानिंग और लॉजिस्टिक्स पर काम शुरू हो चुका था
  3. भारत को BRICS देशों का भी समर्थन मिला हुआ था

COP Summit कैसे तय होता है?

COP समिट हर साल आयोजित होता है और इसकी मेज़बानी क्षेत्रीय समूहों के अनुसार तय होती है। भारत एशिया-प्रशांत समूह का हिस्सा है, जिसे 2028 में यह मौका मिल सकता था।

आने वाले COP Host देश:

  • COP30: Brazil
  • COP31: Turkey और Australia
  • COP32: Ethiopia

अब भारत के हटने के बाद South Korea को COP33 की मेज़बानी का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है।

क्या भारत के क्लाइमेट टारगेट पर असर पड़ेगा?

  • भारत के इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि वह अपने जलवायु लक्ष्यों से पीछे हट रहा है।
  • भारत ने स्पष्ट किया है कि उसकी क्लाइमेट कमिटमेंट्स पूरी तरह ट्रैक पर हैं

भारत के प्रमुख लक्ष्य:

  • 2035 तक 60% क्लीन एनर्जी कैपेसिटी
  • GDP की 47% एमिशन इंटेंसिटी में कमी
  • वन क्षेत्र में वृद्धि करके कार्बन अवशोषण बढ़ाना

COP33 की मेज़बानी से पीछे हटना भारत का एक रणनीतिक और योजनाबद्ध निर्णय माना जा रहा है। हालांकि, यह कदम चौंकाने वाला जरूर है, लेकिन भारत की जलवायु प्रतिबद्धता और वैश्विक भूमिका पर इसका कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत वैश्विक क्लाइमेट मंच पर अपनी भूमिका को कैसे और मजबूत करता है।

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Sanjeev Kumar

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