भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने अपनी निर्धारित ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) खरीद को आगे बढ़ा दिया है। अब केंद्रीय बैंक सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद के ज़रिये प्रणाली में ₹1 लाख करोड़ की तरलता डालेगा, ताकि तरलता की स्थिति को स्थिर किया जा सके और बॉन्ड बाज़ार में बनी नकारात्मक धारणा को शांत किया जा सके।
RBI ने सरकारी प्रतिभूतियों की OMO खरीद नीलामियों के समय में बदलाव किया है। यह फैसला ऐसे समय लिया गया है जब बैंकिंग प्रणाली में तरलता अधिशेष तेजी से घटकर सामान्य स्तर से नीचे आ गया और बेंचमार्क बॉन्ड यील्ड 11 महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गई।
ओपन मार्केट ऑपरेशन RBI का एक प्रमुख मौद्रिक उपकरण है, जिसके माध्यम से वह बाज़ार में तरलता का प्रबंधन करता है। जब RBI सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीदता है, तो वह बैंकिंग प्रणाली में धन प्रवाहित करता है, जिससे तरलता बढ़ती है और उधारी की लागत कम होती है। वर्तमान स्थिति में 26 जनवरी को तरलता अधिशेष केवल ₹56,987 करोड़ रह गया था, जबकि आरामदायक स्तर ₹1.50 से ₹2.00 लाख करोड़ माना जाता है। इतनी तंग तरलता से ब्याज दरें बढ़ सकती हैं, जिससे कारोबार और सरकार दोनों के लिए कर्ज महंगा हो जाता है। OMO खरीद को आगे बढ़ाकर RBI इसी दबाव को कम करने की कोशिश कर रहा है।
पहले RBI ने 5 फरवरी और 12 फरवरी 2026 को OMO खरीद नीलामियाँ करने की योजना बनाई थी, लेकिन अब इन्हें पहले कर दिया गया है। केंद्रीय बैंक अब 29 जनवरी 2026 और 5 फरवरी 2026 को ₹50,000 करोड़ की दो किश्तों में खरीद करेगा। नीलामियों को पहले आयोजित करना इस बात का संकेत है कि RBI तरलता संकट को लेकर गंभीर है और देर होने पर स्थिति और बिगड़ सकती थी।
बेंचमार्क 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड (6.48% GS 2035) की यील्ड 6 बेसिस पॉइंट बढ़कर 6.72% पर बंद हुई, जो 11 महीनों का उच्चतम स्तर है। चूंकि बॉन्ड की कीमत और यील्ड विपरीत दिशा में चलते हैं, इसलिए कीमत में लगभग 42 पैसे की गिरावट आई। ऊँची यील्ड से सरकार की उधारी महंगी होती है और इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था की ब्याज दरों पर पड़ता है। इसी तेज़ उछाल ने RBI को सक्रिय कदम उठाने के लिए प्रेरित किया।
नुवामा वेल्थ के अनुसार, फरवरी 2025 से अब तक RBI रेपो दर में 125 बेसिस पॉइंट की कटौती कर इसे 5.25% तक ला चुका है, फिर भी यील्ड ऊँची बनी हुई है। इसके पीछे कई घरेलू और वैश्विक कारण हैं, जैसे रुपये की कमजोरी, भारत–अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता और ब्लूमबर्ग इंडेक्स सर्विसेज द्वारा भारत के बॉन्ड को अपने ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स में शामिल करने में देरी। इन कारणों से विदेशी निवेशकों की रुचि प्रभावित हुई है।
वित्त वर्ष 2025–26 के दौरान बैंकिंग प्रणाली में तरलता अस्थिर बनी रही है। रुपये में गिरावट, अग्रिम कर भुगतान और नियमित GST निकासी जैसे कारकों ने बार-बार तरलता को खींचा है। इसके अलावा इस सप्ताह सरकारी बॉन्ड और राज्य विकास ऋण (SDLs) की भारी आपूर्ति भी रही। पर्याप्त मांग के अभाव में यह अतिरिक्त आपूर्ति बॉन्ड बाज़ार पर दबाव डाल रही है, जिससे यील्ड ऊँची बनी हुई है।
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