वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच, भारत के ग्यारह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) ने बचत खातों में न्यूनतम शेष राशि बनाए न रखने पर ग्राहकों से लगभग ₹9,000 करोड़ का जुर्माना वसूला। यह जानकारी वित्त मंत्रालय ने राज्यसभा में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में साझा की। इस खुलासे ने इस जुर्माने की न्यायसंगतता को लेकर फिर से बहस छेड़ दी है, खासकर जब इसका सीधा असर अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के ग्राहकों पर पड़ता है।
जिन प्रमुख बैंकों ने शुल्क हटाए
भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने मार्च 2020 में ही औसत मासिक न्यूनतम शेष राशि पर जुर्माना लगाना बंद कर दिया था। इसके बाद, केनरा बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, पंजाब नेशनल बैंक, इंडियन बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने भी FY26 की दूसरी तिमाही से यह शुल्क समाप्त कर दिया। हालांकि, निजी क्षेत्र के बैंक, जो सार्वजनिक बैंकों की तुलना में अधिक शुल्क वसूलते हैं, अब तक इस जुर्माने को माफ नहीं कर पाए हैं।
जुर्माने के पीछे का तर्क
कुछ बैंक मासिक औसत शेष राशि न बनाए रखने पर शुल्क लगाते थे, जबकि अन्य तिमाही आधार पर दंड वसूलते थे। हालांकि, कुछ खातों को न्यूनतम शेष राशि से छूट दी गई थी, जैसे:
प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY) खाते
बेसिक सेविंग बैंक डिपॉज़िट अकाउंट्स (BSBDA)
वेतन खाते
अन्य विशेष श्रेणियों के खाते
सरकार का रुख और परामर्श
राज्यसभा में उत्तर देते हुए वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि वित्तीय सेवा विभाग (DFS) ने बैंकों को जुर्माने के शुल्क को युक्तिसंगत बनाने की सलाह दी है, खासकर अर्ध-शहरी और ग्रामीण ग्राहकों को राहत देने पर जोर दिया गया है। 11 में से 7 सार्वजनिक बैंकों ने इस सलाह को लागू कर दिया है, जबकि शेष 4 जल्द ही इसका पालन करेंगे।
RBI की दिशानिर्देश
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने इन शुल्कों को लेकर दिशानिर्देश बनाए हैं। बैंक अपने बोर्ड द्वारा स्वीकृत नीति के अनुसार जुर्माने का निर्धारण कर सकते हैं। यह शुल्क, खाते में न्यूनतम आवश्यक राशि और वास्तविक शेष राशि के बीच के अंतर के आधार पर एक निश्चित प्रतिशत के रूप में वसूलना चाहिए। RBI ने यह भी कहा है कि ग्राहक सेवा में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
इन जुर्मानों को लेकर काफी विवाद रहा है —
शहरी ग्राहकों के लिए न्यूनतम शेष राशि बनाए रखना आमतौर पर संभव होता है,
लेकिन अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के ग्राहकों के लिए यह एक अतिरिक्त वित्तीय बोझ बन जाता है।
DFS की सलाह और RBI के दिशा-निर्देश इन कमजोर वर्गों की रक्षा करते हुए, बैंकों को सेवा लागत की वसूली का संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।
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