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चीन-ताइवान-अमेरिका संबंधों की भू-राजनीतिक स्थिति

चीन ने ताइवान को घेरते हुए अपना अब तक का सबसे बड़ा युद्धाभ्यास शुरू कर दिया है। इससे पूर्वी एशिया में ट्रेड और कमर्शियल ट्रेवल को खतरा पैदा हो गया है। ताइवान के आसपास का समुद्री इलाका दुनिया के सबसे बिजी सी रूट्स में शामिल है। इससे पहले से दबाव झेल रही ग्लोबल सप्लाई चेन पर प्रेशर और बढ़ गया है। ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग का हब है और अगर वहां तनाव बढ़ता है तो इससे कंप्यूटर चिप्स की शॉर्टेज (chips shortage) और बढ़ सकती है। 

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स्मार्टफोन समेत मॉडर्न इलेक्ट्रॉनिक्स में कंप्यूटर चिप्स का व्यापक इस्तेमाल होता है। पहले ही दुनिया इसकी कमी से जूझ रही है। दुनियाभर के 90 प्रतिशत आधुनिक सेमीकंडक्टर ताइवान ही बनाता है। पिछले साल ताइवान ने 118 अरब डॉलर का सिर्फ सेमीकंडक्टर निर्यात किया है। इन चिप्स का इस्तेमाल स्मार्टफोन, कार, लैपटॉप और दूसरी इलेक्ट्रॉनिक चीजों में होता है। इसके बिना इन चीजों का उत्पादन संभव नहीं है। यही वजह है कि अमेरिका ताइवान की स्थिति को लेकर चिंता में है।

ताइवान को अमेरिका का समर्थन क्यों

ताइवान के लिए अमेरिकी समर्थन ऐतिहासिक रूप से बीजिंग में साम्यवादी शासन के वॉशिंगटन के विरोध पर आधारित रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में सेमीकंडक्टर के विनिर्माण बाजार पर द्वीप के प्रभुत्व के कारण ताइवान की स्वायत्तता अमेरिका के लिए एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक हित बन गई है। सेमीकंडक्टर्स को कंप्यूटर चिप्स या सिर्फ चिप्स के रूप में भी जाना जाता है। ये उन सभी नेटवर्क उपकरणों के अभिन्न अंग हैं जो हमारे जीवन में अंतर्निहित हो गए हैं। उनके उन्नत सैन्य उपयोग भी हैं।

5जी इंटरनेट हर तरह के कनेक्टेड डिवाइस (इंटरनेट ऑफ थिंग्स) और नेटवर्क वाले हथियारों की एक नई पीढ़ी को सक्षम कर रहा है। इसे ध्यान में रखते हुए, अमेरिकी अधिकारियों ने ट्रम्प प्रशासन के दौरान महसूस करना शुरू कर दिया कि अमेरिकी सेमीकंडक्टर डिजाइन कंपनियां अपने उत्पादों के निर्माण के लिए एशियाई-आधारित आपूर्ति श्रृंखलाओं पर बहुत अधिक निर्भर थीं। टीएसएमसी की वैश्विक फाउंड्री बाजार में 53% बाजार हिस्सेदारी है। ताइवान की दूसरी कंपनियों की ग्लोबल मार्केट में 10% हिस्सेदारी है।

ताइवान का इतिहास और वर्तमान स्थिति:

1) ताइवान को चीन गणराज्य (आरओसी) के रूप में जाना जाता है, ताइवान जलडमरूमध्य द्वारा चीन से अलग किया गया एक द्वीप।

2) बता दें कि 1949 में हुए गृहयुद्ध के बाद ताइवान और चीन अलग हो गए थे। ताइवान कभी भी चीन का हिस्सा नहीं रहा है, जबकि चीन इसे अपना हिस्सा मानता है।

3) चीन की सत्तारूढ़ कुओ-मिंटांग (राष्ट्रवादी) सरकार 1945-1949 के चीनी गृहयुद्ध में कम्युनिस्ट ताकतों द्वारा पराजित होने के बाद ताइवान भाग गई।

4) गृहयुद्ध में चीन और ताइवान के विभाजन के बाद, चीन गणराज्य (आरओसी) सरकार को ताइवान में स्थानांतरित कर दिया गया था। दूसरी ओर, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) ने मुख्य भूमि में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) की स्थापना की। तब से, पीआरसी ताइवान को एक गद्दार प्रांत के रूप में देखता है और ताइवान के साथ पुन: एकीकरण की प्रतीक्षा कर रहा है

5) बीजिंग का कहना है कि वन चाइना पॉलिसी और ताइवान चीन का अविभाज्य हिस्सा है।

6) बीजिंग का कहना है कि ताइवान 1992 की आम सहमति से बाध्य है जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और उस समय ताइवान पर शासन करने वाली कुओ-मिंगतांग पार्टी के बीच हुई थी।

7) चीन के लिए जलडमरूमध्य के दो पक्ष एक चीन के हैं लेकिन ताइवान में लोकतांत्रिक प्रगतिशील पार्टी इससे सहमत नहीं है।

8) ताइवान जलडमरूमध्य – सबसे व्यस्त शिपिंग मार्ग

9) द्वीप स्थान – जापान और दक्षिण चीन सागर को जोड़ने वाला, उच्च भू-राजनीतिक महत्व रखता है।


ताइवान के साथ अमेरिकी संबंध: अमेरिका का ताइवान के साथ कोई आधिकारिक संबंध नहीं है, लेकिन अमेरिका अपने अनौपचारिक दूतावास के माध्यम से ताइवान के साथ गहरा संबंध रखता है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के हिंद प्रशांत क्षेत्र के संयोजक कुर्त कैंपबेल ने पिछले सप्ताह बताया था कि ताइवान के साथ व्यापार को लेकर बातचीन हमारे संबंधों को गहरा करने के प्रयासों का हिस्सा होगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपनी नीति नहीं बदल रहा है।

अमेरिका और चीन के बीच संबंध: अमेरिका और चीन के बीच संबंध अच्छे नहीं है। बीजिंग द्वारा मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार और हांगकांग में की गयी कार्रवाई के साथ-साथ सुरक्षा और प्रौद्योगिकी को लेकर अमेरिका और चीन के संबंध सबसे निचले स्तर पर है।

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