हरियाणा ने दो हड़प्पा स्थलों को संरक्षित पुरातात्विक स्मारक घोषित किया

हरियाणा सरकार ने भिवानी जिले में स्थित दो हड़प्पा सभ्यता स्थलों — मिताथल और टीघराना — को आधिकारिक रूप से संरक्षित पुरातात्विक स्थल और स्मारक घोषित किया है। ये स्थल लगभग 4,400 वर्ष पुराने हैं और इनका ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक है। ये स्थल प्रारंभिक कृषि समाजों के विकास, नगर नियोजन, शिल्प उद्योग और हड़प्पा व उत्तर-हड़प्पा काल में व्यापार की झलक प्रस्तुत करते हैं। हरियाणा विरासत एवं पर्यटन विभाग द्वारा हरियाणा प्राचीन एवं ऐतिहासिक स्मारक तथा पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1964 के तहत इन स्थलों को कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई है। इस कदम का उद्देश्य इन प्राचीन बस्तियों को अतिक्रमण और क्षति से बचाना है, जिसके लिए अब यहां बाड़बंदी और सुरक्षा व्यवस्था की जाएगी।

मुख्य बिंदु: कानूनी संरक्षण

हरियाणा सरकार द्वारा 13 मार्च 2025 को एक अधिसूचना जारी की गई, जिसे हरियाणा विरासत एवं पर्यटन विभाग की प्रधान सचिव कला रामचंद्रन ने जारी किया। इस अधिसूचना के तहत मिताथल और टीघराना स्थलों को हरियाणा प्राचीन एवं ऐतिहासिक स्मारक तथा पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1964 के अंतर्गत संरक्षित घोषित किया गया है। मिताथल का स्थल लगभग 10 एकड़ में फैला हुआ है और इसे अब औपचारिक रूप से कानूनी सुरक्षा प्राप्त हो गई है।

मिताथल स्थल (हड़प्पा सभ्यता)

मिताथल स्थल की खोज सबसे पहले 1913 में हुई थी, जहां से समुद्रगुप्त (गुप्त वंश) के सिक्कों का एक खजाना प्राप्त हुआ था। इसके बाद 1968 में खुदाई की गई, जिसमें भारत-गंगा दोआब क्षेत्र की ताम्र-कांस्य युगीन संस्कृति (ईसा पूर्व तीसरी से दूसरी सहस्राब्दी) के महत्वपूर्ण प्रमाण मिले। 1965 से 1968 के बीच हुई खुदाइयों में पूर्व-ऐतिहासिक सामग्री जैसे मालाएं (beads) और तांबे के उपकरण पाए गए, जो उस काल की सामाजिक, सांस्कृतिक और तकनीकी प्रगति को दर्शाते हैं।

पुरातात्विक विशेषताएँ

मिताथल स्थल पर हड़प्पा शैली की नगर योजना, वास्तुकला, कला और शिल्प के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं।

मृद्भांड (Pottery): यहाँ से पाई गई मिट्टी की हांड़ियाँ मजबूत लाल रंग की हैं, जो अच्छी तरह से पकाई गई थीं और उन पर काले रंग से पीपल के पत्ते, मछली के शल्क, और ज्यामितीय आकृतियाँ चित्रित थीं।

कलात्मक वस्तुएँ (Artifacts): खुदाई में मालाएं, चूड़ियाँ, टेरीकोटा (मृत्तिका शिल्प) तथा पत्थर, शंख, तांबा, हाथी दांत, और हड्डी से बनी वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं, जो उस काल के विकसित हस्तशिल्प और व्यापार की जानकारी देती हैं।

तिगराना स्थल (उत्तर-हड़प्पा / ताम्रपाषाण संस्कृति)

तिगराना एक प्रमुख पुरातात्विक स्थल है, जिसकी बस्ती लगभग 2400 ईसा पूर्व की मानी जाती है। यह क्षेत्र ताम्रपाषाण कालीन कृषि समुदायों, जिन्हें सोथी समुदाय कहा जाता है, द्वारा बसाया गया था।

यह स्थल हरियाणा के चांग, मिताथल, तिगराना और आस-पास के क्षेत्रों में फैला हुआ था, जहाँ इस संस्कृति के स्पष्ट अवशेष पाए गए हैं। यह बस्ती हड़प्पा के बाद के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास को दर्शाती है।

बस्ती की विशेषताएँ

तिगराना स्थल पर पाई गई बस्तियाँ फूस की छतों वाले कच्ची ईंटों से बने घरों की थीं, जिनमें से कुछ के किलेबंद होने की संभावना भी जताई गई है। प्रत्येक बस्ती में 50 से 100 घर पाए गए, जो उस समय की जनसंख्या और सामाजिक संगठन को दर्शाते हैं।

जीवनशैली और उपकरण

यहाँ के निवासी कृषि कार्य करते थे और उन्होंने गाय, बैल और बकरी जैसे पशुओं को पालतू बनाया था। वे पहिए से बनाए गए मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करते थे, जिन पर काले और सफेद द्विवर्णीय डिज़ाइनों में चित्रकारी की गई थी। इसके अलावा, उन्होंने तांबे, कांसे और पत्थर के औजारों का भी बड़े पैमाने पर प्रयोग किया।

हस्तशिल्प उद्योग

इस क्षेत्र में मनकों और हरे कार्नेलियन से बने कंगनों की मौजूदगी इस बात की पुष्टि करती है कि यहाँ आभूषण निर्माण और मनका-निर्माण व्यापार प्रचलित था।

खोज और महत्व

तिगराना स्थल से पूर्व-सिसवाल, पूर्व-हड़प्पा और उत्तर-हड़प्पा काल से संबंधित अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिससे यह स्थल एक महत्वपूर्ण कालानुक्रमिक (chronological) पुरातात्विक स्थल बन जाता है।

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vikash

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