नव वर्ष दिवस, जो हर साल 1 जनवरी को मनाया जाता है, ग्रेगोरियन कैलेंडर के नए वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है। इसे दुनिया भर में खुशी, परंपराओं और नए संकल्पों के साथ मनाया जाता है। इस तारीख का महत्व एक लंबे ऐतिहासिक सफर से जुड़ा है, जिसमें प्राचीन सभ्यताएँ, रोमन सुधार, धार्मिक प्रभाव और वैश्विक कैलेंडर व्यवस्था शामिल हैं, जिन्होंने मिलकर आज के सार्वभौमिक उत्सव को आकार दिया।
नव वर्ष दिवस ग्रेगोरियन कैलेंडर का पहला दिन होता है, जिसे आज अधिकांश देश आधिकारिक रूप से अपनाते हैं। यह नई शुरुआत, आशा और नए अवसरों का प्रतीक है। लोग इसे पार्टियों, आतिशबाज़ी, प्रार्थनाओं, पारिवारिक समारोहों और व्यक्तिगत संकल्पों के माध्यम से मनाते हैं, जो आने वाले वर्ष के प्रति सकारात्मक सोच को दर्शाता है।
नए साल को मनाने की परंपरा हजारों साल पुरानी है। लगभग 2000 ईसा पूर्व, बेबीलोनियन सभ्यता में वसंत विषुव के समय नया साल मनाया जाता था। प्रारंभिक रोमन कैलेंडर में भी वर्ष की शुरुआत मार्च से होती थी और उसमें केवल दस महीने होते थे।
1 जनवरी को नव वर्ष दिवस बनाने में रोमन सभ्यता की अहम भूमिका रही। जनवरी महीने का नाम जानस (Janus) नामक देवता पर रखा गया था, जिन्हें आरंभ और परिवर्तन का देवता माना जाता था। 46 ईसा पूर्व में जूलियस सीज़र ने कैलेंडर में सुधार कर 1 जनवरी को वर्ष की आधिकारिक शुरुआत घोषित किया, जिससे यह परंपरा स्थायी बन गई।
मध्यकाल में विभिन्न ईसाई क्षेत्रों में नया साल अलग-अलग तारीखों पर मनाया जाता था, जैसे 25 दिसंबर, 1 मार्च, 25 मार्च या ईस्टर। बाद में ग्रेगोरियन कैलेंडर के प्रसार के साथ 1 जनवरी को धीरे-धीरे स्वीकार किया गया। 18वीं शताब्दी तक कई यूरोपीय देशों ने इसे आधिकारिक रूप से अपना लिया।
जब ग्रेगोरियन कैलेंडर वैश्विक नागरिक कैलेंडर बना, तब प्रशासनिक एकरूपता के लिए 1 जनवरी को पूरी दुनिया में अपनाया गया। आज यह सबसे व्यापक रूप से मनाए जाने वाले त्योहारों में से एक है, जिसे मिडनाइट काउंटडाउन, आतिशबाज़ी, सामाजिक समारोहों और नए साल के संकल्पों के साथ मनाया जाता है।
ईसाई धर्म में नव वर्ष दिवस का आध्यात्मिक महत्व रहा है। पहले इसे फीस्ट ऑफ द सर्कम्सिशन से जोड़ा जाता था और बाद में मरियम के पर्व से। कई संस्कृतियों में इस दिन प्रार्थना सभाएँ और जागरण आयोजित किए जाते हैं, जहाँ आभार और आस्था के साथ नए वर्ष का स्वागत किया जाता है।
आज भी 1 जनवरी एक नई शुरुआत, बीते वर्ष पर आत्मचिंतन और भविष्य के लिए आशा का प्रतीक है। भले ही कई संस्कृतियाँ अपने पारंपरिक नव वर्ष जैसे चीनी नव वर्ष या नवरोज़ मनाती हों, लेकिन 1 जनवरी आज भी एकता और नवचेतना का वैश्विक प्रतीक बना हुआ है।
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