भारत ने जलवायु कार्रवाई और औद्योगिक डी-कार्बोनाइजेशन की दिशा में एक और अहम कदम उठाया है। जनवरी 2026 में सरकार ने कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) के तहत अतिरिक्त कार्बन-गहन क्षेत्रों के लिए ग्रीनहाउस गैस एमिशन इंटेंसिटी (GEI) लक्ष्य अधिसूचित किए। इस फैसले से भारतीय कार्बन बाजार का दायरा बढ़ा है और उत्सर्जन घटाने के साथ-साथ सतत आर्थिक विकास के प्रति भारत की प्रतिबद्धता और मजबूत हुई है।
सरकार ने कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम के अंतर्गत अतिरिक्त कार्बन-गहन क्षेत्रों के लिए GEI लक्ष्य अधिसूचित किए हैं, जिससे 208 नई अनिवार्य इकाइयाँ (obligated entities) भारतीय कार्बन बाजार के अनुपालन ढांचे में शामिल हो गई हैं।
GEI लक्ष्य अधिसूचित करके सरकार यह सुनिश्चित करती है कि उत्सर्जन-गहन उद्योग:
यह मॉडल विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए उपयुक्त है, जहाँ औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को साथ-साथ आगे बढ़ाना जरूरी है।
नवीन अधिसूचना के बाद, विभिन्न कार्बन-गहन क्षेत्रों की 208 अतिरिक्त अनिवार्य इकाइयों को निर्धारित GEI कमी लक्ष्यों का पालन करना होगा।
इसके साथ:
ये इकाइयाँ देश के सबसे अधिक उत्सर्जन करने वाले उद्योगों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिससे यह योजना औद्योगिक उत्सर्जन घटाने का एक केंद्रीय साधन बनती है।
यह अधिसूचना पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी की गई है। मंत्रालय:
CCTS के तहत:
भारतीय कार्बन बाजार व्यापार योग्य कार्बन क्रेडिट के सिद्धांत पर आधारित है।
सामान्यतः एक कार्बन क्रेडिट = एक टन CO₂ समतुल्य उत्सर्जन में कमी या उसका अवशोषण।
इससे स्वच्छ उत्पादन को वित्तीय प्रोत्साहन मिलता है और लो-कार्बन तकनीकों में निवेश बढ़ता है। नई इकाइयों के जुड़ने से बाजार की तरलता और विश्वसनीयता भी मजबूत होती है।
उद्योगों के लिए यह अधिसूचना:
हालाँकि अल्पकाल में लागत बढ़ सकती है, लेकिन दीर्घकाल में:
जैसे लाभ मिलेंगे। वैश्विक स्तर पर सख्त होते कार्बन नियमों के बीच, समय रहते अनुकूलन करने वाले उद्योग अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में अधिक सक्षम बनेंगे।
कुल मिलाकर, यह पहल पर्यावरणीय जिम्मेदारी और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाते हुए भारत की जलवायु रणनीति को मजबूत करती है।
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