Tirupati प्रसादम की क्वालिटी चेक के लिए E-Tongue और E-Nose मशीनें

आंध्र प्रदेश सरकार तिरुमाला में भक्तों को परोसे जाने वाले प्रसादम और अन्य भोजन की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए एक अत्याधुनिक फूड टेस्टिंग लैब स्थापित करने जा रही है। तिरुमाला मंदिर परिसर में ₹25 करोड़ की लागत से एक नई अत्याधुनिक फूड टेस्टिंग लैब स्थापित की जा रही है। इसमें E-Nose (इलेक्ट्रॉनिक नाक) और E-Tongue (इलेक्ट्रॉनिक जीभ) तकनीक का उपयोग किया जाएगा, ताकि प्रसादम और घी, सूखे मेवे, मसालों जैसी सामग्री की गुणवत्ता की निगरानी की जा सके। यह कदम 2024 में तिरुमला लड्डुओं में कथित मिलावटी घी विवाद के बाद उठाया गया है। इस पहल को भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) का समर्थन प्राप्त है। सेंसर-आधारित ये सिस्टम AI संचालित विश्लेषण के जरिए खाद्य सुरक्षा को मजबूत करेंगे।

E-Nose (इलेक्ट्रॉनिक नाक) क्या है?

E-Nose एक सेंसर-आधारित उपकरण है जो खाद्य पदार्थों से निकलने वाली गंध और वाष्पशील यौगिकों (VOCs) का पता लगाता है।

यह कैसे काम करता है?

  • गैस सेंसरों की एक श्रृंखला (Array) का उपयोग
  • वाष्पशील ऑर्गेनिक कंपाउंड (VOCs) की पहचान
  • विद्युत संकेत (Electrical Signals) उत्पन्न करना
  • AI आधारित पैटर्न पहचान से गंध “फिंगरप्रिंट” का मिलान

यह किसी एक रसायन की पहचान करने के बजाय गैस पैटर्न का विश्लेषण कर सड़न, किण्वन परिवर्तन या मिलावट का पता लगाता है। इसका उपयोग डेयरी, खाद्य तेल और प्रोसेस्ड फूड उद्योग में व्यापक रूप से होता है।

E-Tongue (इलेक्ट्रॉनिक जीभ) क्या है?

E-Tongue तरल पदार्थों में स्वाद से जुड़े रासायनिक तत्वों का विश्लेषण करती है।

प्रमुख विशेषताएँ:

  • कई इलेक्ट्रोकेमिकल सेंसर का उपयोग
  • मीठा, नमकीन, खट्टा, कड़वा स्वाद देने वाले घुले पदार्थों की पहचान
  • विद्युत प्रतिक्रिया पैटर्न तैयार करना
  • सांख्यिकीय और मशीन लर्निंग मॉडल से वर्गीकरण

यह तकनीक तेल, पेय पदार्थ और डेयरी उत्पादों की गुणवत्ता व मिलावट जांचने में उपयोगी है।

दोनों उपकरण साथ में क्यों उपयोग किए जा रहे हैं?

मल्टी-सेंसर फूड एनालिसिस शोध के अनुसार, E-Nose और E-Tongue को साथ उपयोग करने से अधिक सटीक परिणाम मिलते हैं।

उपकरण क्या पहचानता है

  • E-Nose वाष्पशील यौगिक (सुगंध, सड़न, प्रदूषण)
  • E-Tongue घुले रसायन (स्वाद, संरचना में बदलाव)

संयुक्त रूप से ये सक्षम होंगे:

  • मिलावट का तेज़ पता लगाना
  • ताजगी में बदलाव की पहचान
  • स्वाद की एकरूपता सुनिश्चित करना
  • बिना नुकसान (Non-destructive) परीक्षण करना

यह तरीका पारंपरिक लैब जांच की तुलना में तेज़ और प्रभावी है।

तिरुमला में यह तकनीक क्यों लागू की जा रही है?

2024 के घी मिलावट घोटाले के बाद यह कदम उठाया गया है, जब CM चंद्रबाबू नायडू ने CBI-SIT जाँच कराई। रिपोर्ट में 2019-24 के बीच ₹250 करोड़ के मिलावटी घी के इस्तेमाल का खुलासा हुआ। अब यह लैब प्रसादम की 60 सामग्रियों जैसे घी, काजू, किशमिश, बादाम, चना, चीनी, इलायची, हल्दी, मिर्च पाउडर आदि की जाँच करेगी।

विशेष जांच दल (SIT) ने पुष्टि की कि आपूर्ति किए गए घी में निम्न मिलावट पाई गई:

  • पाम ऑयल
  • पाम कर्नेल ऑयल
  • बीटा-कैरोटीन
  • एसिटिक एसिड एस्टर
  • कृत्रिम घी फ्लेवर

इसके बाद सरकार ने कच्चे माल और तैयार प्रसादम की निगरानी कड़ी करने के लिए आधुनिक लैब को मंजूरी दी।

डेटा का विश्लेषण कैसे होता है?

दोनों उपकरण कम्प्यूटेशनल विश्लेषण पर आधारित हैं।

प्रक्रिया:

  • सेंसर डेटा को विद्युत संकेतों में बदला जाता है
  • सांख्यिकीय उपकरणों से प्रोसेस किया जाता है
  • मशीन लर्निंग मॉडल द्वारा वर्गीकृत किया जाता है
  • गुणवत्ता के रेफरेंस डेटाबेस से तुलना की जाती है

AI की प्रगति के कारण ये सिस्टम समय के साथ नए नमूनों के विश्लेषण से और अधिक सटीक होते जाते हैं।

खाद्य सुरक्षा में लाभ

पारंपरिक लैब परीक्षण समय लेने वाला और मैनुअल हस्तक्षेप पर निर्भर होता है। मंदिर परिसर में यह धार्मिक प्रक्रियाओं से भी टकरा सकता है।

नई प्रणाली के लाभ:

  • तेज़ और स्वचालित जांच
  • बिना नुकसान परीक्षण
  • मानवीय हस्तक्षेप में कमी
  • असामान्यता की शुरुआती पहचान
  • धार्मिक प्रक्रियाओं को प्रभावित किए बिना नियमित जांच

हालांकि, अधिकारी स्पष्ट करते हैं कि ये उपकरण प्रारंभिक स्क्रीनिंग टूल हैं और पूर्ण प्रयोगशाला परीक्षण का विकल्प नहीं हैं।

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vikash

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