दिल्ली सरकार जून 2025 के अंत तक अपनी पहली क्लाउड सीडिंग (कृत्रिम वर्षा) की परीक्षण उड़ान आयोजित करने जा रही है, बशर्ते नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) से अंतिम अनुमति मिल जाए। यह प्रयास IIT कानपुर द्वारा विकसित तकनीक पर आधारित है, और इसमें भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) व रक्षा मंत्रालय का सहयोग प्राप्त है। इस पहल का उद्देश्य अत्यधिक प्रदूषण या जल संकट के समय कृत्रिम वर्षा की व्यवहार्यता का परीक्षण करना है।
दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मंजींदर सिंह सिरसा ने 19 जून को पुष्टि की कि दिल्ली सरकार को क्लाउड सीडिंग ट्रायल के लिए लगभग सभी प्रमुख एजेंसियों से अनुमतियाँ मिल चुकी हैं।
यह ₹3.21 करोड़ की लागत वाला दिल्ली का पहला क्लाउड सीडिंग पायलट प्रोजेक्ट होगा, जिसका उद्देश्य विशेष नमक और रासायनिक मिश्रण के माध्यम से कृत्रिम वर्षा उत्पन्न करना है।
मुख्य लक्ष्य: उच्च प्रदूषण स्तर के दौरान क्लाउड सीडिंग की तकनीकी क्षमता का परीक्षण करना
यह चरण वायु गुणवत्ता सुधार पर केंद्रित नहीं है, लेकिन वर्षा के कारण प्रदूषक स्तरों में गिरावट आ सकती है
परीक्षण स्थान: दिल्ली के बाहरी क्षेत्र (VIP वर्जित क्षेत्रों से दूर)
कुल बजट: ₹3.21 करोड़
प्रति ट्रायल खर्च: ₹55 लाख
लॉजिस्टिक्स व भंडारण: ₹66 लाख
उड़ान योजना: 5 उड़ानों में लगभग 100 वर्ग किमी क्षेत्र को कवर किया जाएगा
लॉन्च का समय: जून 2025 के अंत तक, मौसम विभाग से अनुकूल मौसम की पुष्टि के बाद
उड़ान का आधार: हिंडन एयर बेस, गाज़ियाबाद (रक्षा मंत्रालय से अनुमति प्राप्त)
क्लाउड सीडिंग एजेंट:
सिल्वर आयोडाइड (AgI)
पाउडर रॉक सॉल्ट
आयोडाइज्ड सॉल्ट
हाइज्रोस्कोपिक व ग्लेशियोजेनिक गुणों से युक्त मिश्रण
आदर्श बादल: निम्बोस्ट्रेटस (Nimbostratus) — 500 से 6000 मीटर ऊंचाई, 50% या अधिक नमी
पर्यावरण प्रभाव:
IIT कानपुर द्वारा वर्षा जल में सिल्वर आयोडाइड की जांच की जाएगी
प्रारंभिक विश्लेषणों के अनुसार, इसका पर्यावरणीय प्रभाव नगण्य है
अनुमतियाँ प्राप्त की गईं / अपेक्षित:
SPG
CPCB
पर्यावरण, रक्षा और गृह मंत्रालय
DGCA, AAI, BCAS
उत्तर प्रदेश सरकार
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD)
IMD की भूमिका:
हर 6 घंटे में बादलों की नमी और घनत्व पर अपडेट देगा
उसी के आधार पर उड़ानों की योजना बनाई जाएगी
मंत्री मंजींदर सिंह सिरसा:
“यह ट्रायल केवल वायु गुणवत्ता नहीं, बल्कि तकनीकी व्यवहार्यता को परखने के लिए है।”
IIT कानपुर:
“सिल्वर आयोडाइड का प्रभाव न्यूनतम प्रतीत होता है, लेकिन वर्षा के बाद के आंकड़े ही पुष्टि करेंगे।”
यह प्रयास दिल्ली सरकार की वैज्ञानिक नवाचारों और पर्यावरणीय समाधानों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है, और भविष्य में जल संकट व प्रदूषण नियंत्रण के लिए एक संभावित विकल्प हो सकता है।
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