चीन ने गैर-परमाणु हाइड्रोजन बम का सफलतापूर्वक परीक्षण किया

चीन ने हाल ही में एक क्रांतिकारी प्रकार के हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया है, जो पारंपरिक विखंडनीय पदार्थों जैसे यूरेनियम या प्लूटोनियम के बिना कार्य करता है। इसके बजाय, यह मैग्नीशियम हाइड्राइड-आधारित फ्यूजन जैसी उन्नत संलयन तकनीकों का उपयोग करता है। इस विकास ने हथियार नियंत्रण, अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा कर दी हैं। यह प्रगति आधुनिक युद्ध में परमाणु हथियारों की धारणा और उनके नियमन को पूरी तरह से पुनर्परिभाषित कर सकती है।

मुख्य बिंदु

हाइड्रोजन बम क्या है?

  • इसे थर्मोन्यूक्लियर बम भी कहा जाता है।

  • दो-चरणीय प्रक्रिया:

    • प्राथमिक चरण (विखंडन): यूरेनियम-235 या प्लूटोनियम-239 का उपयोग कर अत्यधिक ताप और दबाव उत्पन्न किया जाता है।

    • द्वितीयक चरण (संलयन): हाइड्रोजन समस्थानिक (ड्यूटेरियम और ट्रिटियम) अत्यधिक परिस्थितियों में संलयित होकर विशाल ऊर्जा छोड़ते हैं।

विखंडनीय पदार्थों के बिना हाइड्रोजन बम क्या है?

  • इसमें यूरेनियम या प्लूटोनियम का उपयोग नहीं किया जाता।

  • वैकल्पिक प्रज्वलन प्रणालियों का प्रयोग होता है:

    • जड़त्वीय संपीड़न संलयन (Inertial Confinement Fusion – ICF): उच्च-शक्ति लेज़रों द्वारा ईंधन को संपीड़ित और गर्म किया जाता है।

    • चुंबकीय संपीड़न (जैसे Z-पिंच प्लाज़्मा प्रणाली): चुंबकीय क्षेत्रों का उपयोग करके संलयन प्रारंभ किया जाता है।

  • हाइड्रोजन समस्थानिक अब भी संलयित होते हैं, लेकिन बिना पारंपरिक परमाणु विकिरण या रेडियोधर्मी अवशेष के।

प्रमुख चिंताएँ

  • कानूनी शून्य:

    • एनपीटी (परमाणु अप्रसार संधि) और सीटीबीटी (परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि) जैसे समझौते परमाणु हथियारों को विखंडनीय पदार्थों के आधार पर परिभाषित करते हैं।

    • ये नए बम उन परिभाषाओं को दरकिनार कर एक कानूनी धुंधला क्षेत्र उत्पन्न करते हैं।

  • विकास में आसानी:

    • ड्यूटेरियम और ट्रिटियम जैसे संलयन ईंधनों पर नियंत्रण कम है।

    • संलयन तकनीकें द्वैध-उपयोगी (civilian और सैन्य दोनों) होती हैं, जिससे उनका दुरुपयोग संभव है।

  • प्रसार का खतरा:

    • दुष्ट राष्ट्रों या आतंकी समूहों द्वारा इनके दुरुपयोग की संभावना अधिक है।

    • विकिरण चिह्न के अभाव में इन्हें ट्रैक करना या पहचानना कठिन है।

  • असमान युद्ध:

    • छोटे आकार के, शक्तिशाली और गैर-रेडियोधर्मी ये हथियार गुप्त हमलों, ग्रे-ज़ोन युद्ध, औद्योगिक भेष या तस्करी में उपयोग किए जा सकते हैं।

आगे की राह

  • वैश्विक संधियों का अद्यतन:

    • सीटीबीटी को विखंडन-मुक्त संलयन परीक्षणों को भी शामिल करने हेतु विस्तारित करना।

    • परमाणु हथियारों को केवल विखंडनीय पदार्थों से नहीं, बल्कि उनकी ऊर्जा उत्पादन क्षमता से परिभाषित करना।

  • नए सत्यापन तंत्र बनाना:

    • अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के तहत एक “संलयन हथियार सत्यापन निकाय” (Fusion Weapons Verification Body – FWVB) की स्थापना करना।

    • इसे रासायनिक हथियारों के नियंत्रण निकाय (OPCW) की तर्ज पर संचालित करना।

  • भारत की रणनीति:

    • “विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध” (Credible Minimum Deterrence) नीति के अंतर्गत भारत को स्वयं को अनुकूल बनाना चाहिए।

    • गैर-विकिरणीय विस्फोटों और संलयन-आधारित खतरों का पता लगाने के लिए नई तकनीकों में निवेश करना आवश्यक है।

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vikash

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