चंपकम दोरायराजन मामला: संवैधानिक इतिहास में एक ऐतिहासिक मामला

चंपकम दोरायराजन, जो मद्रास की एक ब्राह्मण महिला थीं, ने भारत के संवैधानिक इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने शैक्षिक संस्थानों में जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी। उनका मामला, स्टेट ऑफ मद्रास बनाम चंपकम दोरायराजन (1951), भारत के संविधान के पहले संशोधन का आधार बना, जिसने अनुच्छेद 15(4) को जोड़ा और सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों को कानूनी मान्यता दी। यह मामला भारतीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा किसी कानून को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर असंवैधानिक ठहराने का पहला उदाहरण था, जिसने योग्यता, समानता और आरक्षण पर भविष्य की बहसों की नींव रखी।

मामले के प्रमुख बिंदु

चंपकम दोरायराजन का परिचय

  • जन्म: 1915, मद्रास
  • शिक्षा: मद्रास विश्वविद्यालय से भौतिकी और रसायनशास्त्र में बी.एससी. (1934)
  • डॉक्टर बनने की इच्छा थी, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण शिक्षिका बनीं
  • व्यापारिक परिवार में विवाह हुआ; उनके पति Dollar & Company फार्मा कंपनी चलाते थे
  • मद्रास (अब चेन्नई) में रहीं और कानूनी मामलों की गहरी समझ रखती थीं

विवादास्पद सामुदायिक सरकारी आदेश (G.O.)

  • 1948 में मद्रास सरकार ने जाति-आधारित शैक्षिक आरक्षण लागू किया
  • 14 सीटों का वितरण इस प्रकार था:
    • 6 सीटें – गैर-ब्राह्मण हिंदुओं के लिए
    • 2 सीटें – पिछड़े हिंदुओं के लिए
    • 2 सीटें – ब्राह्मणों के लिए
    • 2 सीटें – हरिजन (दलित) के लिए
    • 1 सीट – एंग्लो-इंडियन व ईसाई भारतीयों के लिए
    • 1 सीट – मुसलमानों के लिए
  • इस प्रणाली से ब्राह्मण विद्यार्थियों की मेडिकल व इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश की संभावनाएँ सीमित हो गईं

कानूनी चुनौती और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

  • चंपकम दोरायराजन ने 1950 में मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर कर तर्क दिया कि यह नीति समानता के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन करती है
  • मद्रास हाईकोर्ट ने सामुदायिक सरकारी आदेश (G.O.) को असंवैधानिक घोषित किया
  • मद्रास सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की
  • 9 अप्रैल 1951 को सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय सुनाया कि:
    • जाति और धर्म के आधार पर आरक्षण अनुच्छेद 14, 15(1) और 29(2) का उल्लंघन करता है
    • राज्य शैक्षिक प्रवेश में जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता

प्रभाव: भारतीय संविधान का पहला संशोधन (1951)

  • सरकार को झटका लगा, और उसने इस निर्णय को निष्प्रभावी करने के लिए पहला संवैधानिक संशोधन किया
  • अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया, जिससे निम्न वर्गों के लिए विशेष प्रावधान संभव हुए:
    • सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग (OBC)
    • अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST)
  • इस संशोधन ने शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण को वैध बना दिया

लंबी अवधि के कानूनी और सामाजिक प्रभाव

  • इस मामले ने योग्यता बनाम आरक्षण की बहस को जन्म दिया, जो आज भी जारी है
  • समय के साथ न्यायपालिका ने आरक्षण को सामाजिक न्याय का साधन माना
  • 2024 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने 1951 के फैसले की आलोचना की और इसे आरक्षण के लिए बाधा बताया
  • यह मामला मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14) और राज्य की नीतिगत जिम्मेदारियों (अनुच्छेद 46) के बीच संतुलन तय करने में महत्वपूर्ण रहा, जिससे कई संवैधानिक संशोधन प्रेरित हुए
सारांश/स्थिर जानकारी विवरण
क्यों चर्चा में? चंपकम दोराईराजन और पहला संशोधन: संवैधानिक इतिहास का एक ऐतिहासिक मामला
संबंधित व्यक्ति चंपकम दोराईराजन, मद्रास की एक ब्राह्मण महिला
मुद्दा 1948 के सामुदायिक सरकारी आदेश (Communal G.O.) के कारण जाति आधारित आरक्षण की वजह से मेडिकल कॉलेज में प्रवेश से वंचित
कानूनी कार्रवाई 1950 में मद्रास हाईकोर्ट में मामला दायर किया, बाद में 1951 में सुप्रीम कोर्ट में अपील की
फैसला सुप्रीम कोर्ट ने जाति आधारित कोटा प्रणाली को असंवैधानिक ठहराया
सरकारी प्रतिक्रिया 1951 में पहला संशोधन लाया गया, जिससे शिक्षा में आरक्षण संभव हुआ
नया प्रावधान जोड़ा गया अनुच्छेद 15(4), जो पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान की अनुमति देता है
कानूनी प्रभाव असंवैधानिक कानूनों को निरस्त करने में न्यायपालिका की भूमिका स्थापित की
दीर्घकालिक प्रभाव शिक्षा में आरक्षण के कानूनी आधार को मजबूत किया और भविष्य के संवैधानिक संशोधनों को दिशा दी
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vikash

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