राज्य के दर्जे पर बातचीत के बीच केंद्र ने लद्दाख को अनुच्छेद 371 की पेशकश की

भारत सरकार के गृह मंत्रालय (MHA) ने हाल ही में लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के साथ हुई बैठक में लद्दाख को अनुच्छेद 371 (Article 371) जैसी संवैधानिक व्यवस्था देने का प्रस्ताव रखा है। यह कदम उस समय आया है जब राज्य का दर्जा (Statehood) और संवैधानिक संरक्षण (Constitutional Safeguards) की मांग को लेकर हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों में चार लोगों की मौत हुई थी, जिनमें एक कारगिल युद्ध के पूर्व सैनिक भी शामिल थे।

पृष्ठभूमि: लद्दाख की राजनीतिक मांगें

साल 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को विधानसभा रहित केंद्र शासित प्रदेश (Union Territory without legislature) बनाया गया।
तब से ही क्षेत्र में भूमि अधिकार, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष बढ़ता गया है।

लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) — जो क्रमशः लेह और कारगिल के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं — ने संयुक्त रूप से इन प्रमुख मांगों को रखा है:

  • लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा (Full Statehood)

  • छठी अनुसूची (Sixth Schedule) का दर्जा, ताकि जनजातीय अधिकारों और भूमि स्वामित्व की सुरक्षा हो सके

  • हालिया प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार कार्यकर्ताओं की रिहाई, जिनमें पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी शामिल हैं

  • पुलिस कार्रवाई में मारे गए लोगों के परिजनों को मुआवजा

अनुच्छेद 371 बनाम छठी अनुसूची: मुख्य अंतर

सरकार ने संकेत दिया है कि अनुच्छेद 371 के तहत विशेष प्रावधान लद्दाख पर लागू किए जा सकते हैं। अनुच्छेद 371 वर्तमान में 12 भारतीय राज्यों — जैसे नागालैंड, असम, मिजोरम, सिक्किम आदि — पर लागू है।

इसका उद्देश्य है स्थानीय कानूनों, संस्कृति और प्रशासनिक व्यवस्था की सुरक्षा

वहीं, लद्दाख के संगठनों की मांग है कि क्षेत्र को संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) में शामिल किया जाए, क्योंकि यह अधिक सशक्त सुरक्षा प्रदान करता है।
छठी अनुसूची के तहत —

  • स्वायत्त जिला परिषदें (Autonomous District Councils) बनाई जा सकती हैं

  • उन्हें भूमि, वन, परंपरागत कानून और सामुदायिक प्रथाओं पर कानून बनाने का अधिकार होता है

  • स्थानीय स्वशासन को अधिक मजबूती मिलती है, विशेषकर जनजातीय क्षेत्रों में

क्यों है यह मुद्दा संवेदनशील

लद्दाख की भौगोलिक विषमता, जनजातीय जनसंख्या और सीमा क्षेत्रीय महत्व को देखते हुए, स्थानीय समूहों का कहना है कि केवल अनुच्छेद 371 जैसी व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी। वे चाहते हैं कि क्षेत्र को छठी अनुसूची के तहत लाया जाए, ताकि जनजातीय भूमि और पारंपरिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

आगे की राह

गृह मंत्रालय और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच यह संवाद जारी रहेगा। यह वार्ता न केवल लद्दाख की राजनीतिक स्थिति को पुनर्परिभाषित कर सकती है, बल्कि भारत के सीमावर्ती जनजातीय इलाकों के प्रशासनिक ढांचे पर भी दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है।

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vikash

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