यह ऐतिहासिक फ़ैसला तब आया, जब भारत के माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यह घोषणा की कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर सुरक्षित यात्रा करना, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन के मौलिक अधिकार’ का एक हिस्सा है। यह फ़ैसला सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करने और नागरिकों को रोके जा सकने वाले हादसों से बचाने की राज्य की ज़िम्मेदारी को और मज़बूत करेगा। अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सुरक्षित और बेखौफ़ आवाजाही का अधिकार भी शामिल है—विशेष रूप से तेज़ रफ़्तार वाले राजमार्गों पर।
यह फ़ैसला अब क्यों मायने रखता है
यह फ़ैसला सड़क सुरक्षा से जुड़े चिंताजनक आँकड़ों की पृष्ठभूमि में आया है। भारत के कुल सड़क नेटवर्क में राष्ट्रीय राजमार्गों का हिस्सा सिर्फ़ लगभग 2% है, लेकिन सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली कुल मौतों में इनका योगदान लगभग 30% है।
अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि प्रशासनिक लापरवाही, खराब बुनियादी ढाँचे या अवैध पार्किंग और सड़क किनारे अतिक्रमण जैसी असुरक्षित गतिविधियों के कारण राजमार्गों को जानलेवा गलियारे नहीं बनना चाहिए।
राजमार्गों पर ढाबों और व्यावसायिक ढांचों पर प्रतिबंध
अदालत द्वारा जारी किए गए महत्वपूर्ण निर्देशों में से एक यह है कि राष्ट्रीय राजमार्गों के ‘राइट ऑफ़ वे’ (सड़क के लिए निर्धारित क्षेत्र) के भीतर ढाबों, भोजनालयों या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के निर्माण अथवा संचालन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए।
अदालत ने यह पाया है कि ऐसी जगहों के कारण अक्सर ये समस्याएं पैदा होती हैं:
- भारी वाहनों की अवैध पार्किंग
- यातायात के प्रवाह में रुकावट
- दुर्घटनाओं का बढ़ता जोखिम, विशेष रूप से रात के समय
अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे 60 दिनों के भीतर सभी अनाधिकृत निर्माणों को हटा दें और यह सुनिश्चित करें कि इन निर्देशों का सख्ती से पालन हो।
वाहन पार्किंग और आवाजाही के लिए कड़े नियम
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर वाहनों की आवाजाही के संबंध में भी स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं।
- किसी भी भारी या कमर्शियल वाहन को राजमार्गों पर रुकने या पार्क करने की अनुमति नहीं है।
- पार्किंग की अनुमति केवल निर्धारित जगहों (bays), ले-बाय (lay-bys) या आस-पास की सड़क किनारे बनी सुविधाओं वाली जगहों पर ही है।
- इसके अलावा, सड़क किनारे रुकावटों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
इन उपायों का उद्देश्य अचानक होने वाली टक्करों को कम करना और राजमार्गों पर समग्र सुरक्षा व्यवस्था में सुधार लाना है।
वे दुखद घटनाएँ जिनके कारण यह मामला शुरू हुआ
यह मामला पिछले साल नवंबर में हुई दो दुखद दुर्घटनाओं के बाद स्वतः संज्ञान (suo motu) के आधार पर उठाया गया, जिनमें 34 लोगों की जान चली गई थी।
इनमें से एक घटना राजस्थान के फलोदी में हुई, जहाँ सड़क किनारे बने एक भोजनालय के पास खड़े एक ट्रक से एक टेम्पो ट्रैवलर टकरा गया, जिससे 15 लोगों की मौत हो गई।
तेलंगाना में एक और दुर्घटना हुई, जिसमें सड़क पर बने गड्ढे से बचने की कोशिश करते समय एक बस की लॉरी से टक्कर हो गई और 19 लोगों की मौत हो गई।
इन घटनाओं ने राजमार्ग सुरक्षा में मौजूद गंभीर कमियों को उजागर कर दिया है, जिसके चलते न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी।
सड़क सुरक्षा के लिए नई संस्थागत व्यवस्था
बेहतर कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए, शीर्ष अदालत ने प्रत्येक जिले में ‘जिला राजमार्ग सुरक्षा कार्य बल’ के गठन का निर्देश दिया है।
इसके अतिरिक्त,
- ज़िला मजिस्ट्रेटों को अवैध निर्माणों को हटाने की प्रक्रिया की निगरानी अनिवार्य रूप से करनी होगी।
- राजमार्गों के निकट, बिना आवश्यक मंज़ूरी के कोई भी लाइसेंस या अनुमति प्रदान नहीं की जा सकती।
- साथ ही, NHAI और राज्य की एजेंसियों जैसे विभिन्न प्राधिकरणों के बीच समन्वय स्थापित करना भी अनिवार्य है।
अनुच्छेद 21 के दायरे का विस्तार
यह फैसला अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के दायरे का विस्तार करके उसकी व्याख्या को भी मज़बूत करेगा।
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि:
- राज्य का यह सकारात्मक दायित्व है कि वह सुरक्षित स्थितियों को सुनिश्चित करे।
- साथ ही, लापरवाही के कारण होने वाली जिन मौतों को टाला जा सकता था, वे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं।
- बुनियादी ढांचे और शासन व्यवस्था में मानवीय सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।


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