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अलग कुओं की परंपरा से साझा भोज तक: कैसे सौंदला बना महाराष्ट्र का ‘जाति-मुक्त’ गाँव

सौंदला (मुंबई से लगभग 350 किमी दूर) ने 5 फरवरी 2026 को एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए स्वयं को “जाति-मुक्त गाँव” घोषित किया। ग्राम सभा में सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव के तहत यह तय किया गया कि गाँव में किसी की जाति पूछना, प्रचारित करना या जाति के आधार पर भेदभाव करना स्वीकार्य नहीं होगा। इस पहल का नेतृत्व सरपंच शरद आर्गडे ने किया, जिनका उद्देश्य है कि जाति “सिर्फ कागज़ों तक सीमित रहे, सामाजिक व्यवहार में नहीं।”

ग्राम सभा का ऐतिहासिक प्रस्ताव

यह प्रस्ताव अहिल्यानगर (पूर्व में अहमदनगर) जिले में आयोजित विशेष ग्राम सभा में पारित किया गया। प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से कहा गया कि गाँव में जाति, धर्म, पंथ या रंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा।

प्रस्ताव की मुख्य बातें:

  • किसी की जाति पूछना या सार्वजनिक करना प्रतिबंधित।
  • मंदिर, स्कूल, श्मशान और जलस्रोत सहित सभी सार्वजनिक स्थान सभी के लिए समान रूप से खुले।
  • जाति-आधारित बहिष्कार या भड़काऊ सोशल मीडिया पोस्ट पर सख्त रोक।
  • मार्गदर्शक नारा: “मेरी जाति मानवता है।”

गाँव वालों के अनुसार, यह बदलाव कई वर्षों से धीरे-धीरे विकसित हो रहा था, जिसे अब औपचारिक रूप दिया गया है।

अलग कुओं से साझा भोजन तक

करीब 2,500 की आबादी और लगभग 450 परिवारों वाले इस गाँव की सामाजिक संरचना मिश्रित है। लगभग 70% आबादी ऊँची जातियों से है, जबकि शेष में दलित, कुछ मुस्लिम और ईसाई परिवार शामिल हैं।

बुजुर्गों के अनुसार पहले:

  • अलग-अलग जातियों के लिए अलग कुएँ थे।
  • दलितों को शादियों में अलग बैठाया जाता था।
  • निम्न जाति परिवारों को समारोहों में देर से बुलाया जाता था।
  • मुस्लिम परिवारों से बर्तन अलग धुलवाए जाते थे।

आज स्थिति बदल चुकी है—लोग साथ चाय पीते हैं, त्योहार मिलकर मनाते हैं और एक-दूसरे के घर भोजन करते हैं। यही रोज़मर्रा के छोटे कदम अब सामाजिक समानता के प्रतीक बन चुके हैं।

नेतृत्व की भूमिका

  • सरपंच शरद आर्गडे, जो 2003 से स्थानीय राजनीति में सक्रिय हैं, ने धीरे-धीरे कई प्रगतिशील सुधार लागू किए। उनकी पत्नी प्रियंका आर्गडे (पूर्व सरपंच) ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • प्रियंका ने स्वीकार किया कि शुरुआत में सामाजिक संस्कारों के कारण वे निम्न जाति के घरों में जाने में झिझकती थीं, लेकिन समय के साथ उन्होंने अपने दृष्टिकोण को बदला।
  • ग्राम पंचायत कार्यालय के बाहर छत्रपति शिवाजी महाराज की तस्वीरें जाति से परे एकता का संदेश देती हैं।
  • जाति-मुक्त प्रस्ताव से पहले ही गाँव में हर सुबह राष्ट्रगान बजाने की परंपरा शुरू की गई थी, जिससे साझा राष्ट्रीय पहचान को मजबूत किया जा सके।

अन्य सामाजिक सुधार

जाति-मुक्त घोषणा व्यापक सामाजिक सुधारों का हिस्सा है:

  • गाली-गलौज पर प्रतिबंध: अपशब्दों के उपयोग पर ₹500 का जुर्माना। शिकायत सत्यापन हेतु CCTV की मदद।
  • विधवा पुनर्विवाह सहायता: ₹11,000 की आर्थिक सहायता; कम से कम एक पुनर्विवाह संपन्न।
  • बालिका शिक्षा समर्थन: कक्षा 12 तक यूनिफॉर्म, किताबें और स्टेशनरी उपलब्ध।
  • दो घंटे ‘नो-मोबाइल’ समय: छात्रों के लिए अनिवार्य अध्ययन समय, पंचायत द्वारा निगरानी।
  • अब तक 13 लोगों पर मौखिक दुर्व्यवहार के लिए जुर्माना लगाया गया है, और शराब-संबंधी विवादों में कमी आई है।

सामाजिक संदर्भ और महत्व

  • अहिल्यानगर जिले में हाल के वर्षों में जातीय और सांप्रदायिक तनाव की घटनाएँ सामने आई थीं। पड़ोसी क्षेत्रों में सामाजिक बहिष्कार और ध्रुवीकरण की खबरों ने गाँव नेतृत्व को चिंतित किया।
  • सरपंच आर्गडे के अनुसार, अन्य जगहों पर बढ़ते विभाजन को देखते हुए उन्होंने समय रहते कदम उठाया, ताकि भेदभाव सामाजिक संघर्ष में न बदल जाए।
  • महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रस्ताव सरकारी आरक्षण नीतियों को चुनौती नहीं देता। सरपंच ने स्पष्ट किया कि जाति आधिकारिक दस्तावेजों में बनी रह सकती है, लेकिन दैनिक सामाजिक व्यवहार को प्रभावित नहीं करनी चाहिए।
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