वृंदावन, नंदगांव और बरसाना की अनोखी होली देशभर में प्रसिद्ध है। देश-विदेश के लोग यहां लठमार, लड्डू मार और फूल वाली होली मनाने के लिए आते हैं। लड्डू मार होली के साथ ही मथुरा-वृंदावन में 9 दिनों तक चलने वाली होली की शुरुआत हो जाती है और यह रंगों वाली होली के अगले दिन तक चलती है। भगवान कृष्ण और राधा रानी के मंदिर में धूमधाम से भक्त होली का पर्व मनाते हैं। इस बार लड्डू मार होली 25 फरवरी, बुधवार के दिन मनाई गई। वहीं, 28 फरवरी, शनिवार को फूलों वाली होली मनाई जाएगी।
होली के दीवाने वृंदावन और बरसाना की होली का इंतज़ार पूरे साल करते हैं, और जब बात बांके बिहारी मंदिर में मनाई जाने वाली फूलों की होली की आती है, तो जो सुख और आनंद फूलों की होली खेलने में मिलता है।
वृंदावन में फूलों वाली होली कब खेली जाएगी?
वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में इस साल फूलों की होली 28 फ़रवरी 2026, शनिवार के दिन खेली जाएगी। इस दिन मंदिर में फूलों की बारिश करके होली उत्सव मनाया जाएगा है, जिसकी छटा बेहद मनमोहक होगा। ब्रज में माना जाता है कि कृष्ण और राधा ने वृंदावन की कुंज-गलियों में प्रेमपूर्वक फूलों से होली खेली थी। फूलों की नरम पंखुड़ियों में प्रेम, कोमलता और सौहार्द का संदेश छिपा होता है। इसी प्रेममयी वातावरण को बनाए रखने के लिए आज भी बांके बिहारी मंदिर में भक्तों पर फूल बरसाए जाते हैं।
ब्रज की होली 2026
ब्रज क्षेत्र में होली का त्योहार पूरे 40 दिनों तक मनाया जाता है, बसंत पंचमी से ही होली पर्व की शुरुआत हो जाती है, जिसके बाद होली तक रंग खेलने की परंपरा चली आ रही है। फूलों वाली होली के अलावा यहां की लड्डूमार होली, लठमार होली और हुरंगा होली भी बेहद प्रसिद्ध हैं।
- लड्डूमार होली: लड्डूमार होली 25 फ़रवरी 2026, बुधवार को बरसाना स्थित राधा रानी मंदिर के अंदर खेली गई। इस दिन भक्त एक-दूसरे पर लड्डू फेंककर होली उत्सव मनाते हैं।
- लठमार होली: लठमार होली 26 फ़रवरी 2026, गुरुवार को बरसाना में खेली गई। इस अनोखी परंपरा में विवाहित महिलाएं अपने पतियों व अन्य पुरुषों को लाठी से मारती हैं।
- छड़ी-मार होली: छड़ी-मार होली इस साल 1 मार्च 2026, रविवार को गोकुल में मनाई जाएगी। इस दिन महिलाएं पुरुषों को छड़ी से मारकर पारंपरिक उत्सव मनाती हैं।
फूलों वाली होली की शुरुआत कैसे हुई
यह विशेष होली वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर, बरसाना, नंदगांव और विभिन्न वैष्णव मंदिरों में मनाई जाती है। यह परंपरा मंदिर-उपासना में एक सौम्य और भक्तिपूर्ण रूप में विकसित हुई, जहां रंगों के स्थान पर पुष्प-वर्षा की जाती है। फूल को वैष्णव उपासना में प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना गया है। देवताओं पर पुष्प-वर्षा करना दिव्य आनंद का संकेत होता है। ऐसी मान्यता है कि वसंत ऋतु में वृंदावन के कुंजों में राधा-कृष्ण पुष्पों के बीच क्रीड़ा करते थे। भक्त इसी आनंद का अनुभव करने के लिए फूलों वाली होली मनाते हैं।
लड्डू मार होली क्यों मनाई जाती है
मान्यता है की श्रीकृष्ण और उनके सखा नंदगांव से बरसाना आते थे। वे राधा रानी और सखियों से हंसी-मजाक किया करते थे। सखियां भी उन्हें प्रेमपूर्वक चिढ़ाती थीं। इसी प्रेमपूर्ण वातावरण में मिठाइयों का आदान-प्रदान होता था और इसी भाव से लड्डू मार होली की परंपरा विकसित हुई। माना जाता है कि लड्डू मिठास का प्रतीक और दिव्य प्रेम की मधुरता का संकेत है। यह दर्शाता है कि राधा-कृष्ण की लीला में जो भी नोक-झोंक है वह अंततः प्रेम से भरा हुआ है।


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